2 मौतों के बाद खौफ में बलिया गांव: बिजनौर का 'रैनी जंगल' बना तेंदुओं का खतरनाक गलियारा
बलिया गांव में तेंदुए के हमलों से दो महिलाओं की मौत के बाद दहशत है, बिजनौर का रैनी जंगल तेंदुओं ...और पढ़ें

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HighLights
बिजनौर के रैनी वन की सीमा पर बसा बलिया गांव, दो महिलाओं की मौत से बढ़ी दहशत
मिथलेश के खेत की मेंढ़ जंगल की ओर, हमले के बाद उसी दिशा में भागा था तेंदुआ
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। रामगंगा नदी किनारे बसे बलिया गांव में तेंदुए का खौफ सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। आसपास के गांवों के लोग भी शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते हैं। दिन में भी किसी की खेत की तरफ जाने की हिम्मत नहीं हो रही है। कारण यह है कि 18 अगस्त को विरमो देवी सैनी और 25 अगस्त को मिथलेश सैनी की तेंदुआ हमला करके जान ले चुका है।
गांव के ही नरपत सिंह पर भी तेंदुआ हमला कर चुका है। इन घटनाओं के बीच बिजनौर की सीमा पर फैला रैनी का जंगल बलिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आया है।
मिथलेश सैनी जिस खेत में गई थीं, उसकी मेड़ सीधे जंगल से सटी है। ग्रामीणों के मुताबिक हमला करने के बाद तेंदुआ भी इसी रास्ते से जंगल की ओर निकल गया। यह महज एक रास्ता नहीं, बल्कि जंगल और खेतों के बीच वन्यजीवों की आवाजाही का संभावित गलियारा है।
यही वजह है कि बलिया में दो महिलाओं की मौत के बाद ग्रामीणों की नजर अब गांव के आसपास के खेतों के साथ रैनी जंगल पर भी टिक गई है। बलिया की भौगोलिक स्थिति इस खतरे को और गंभीर बनाती है।
गांव के आसपास खेत, गन्ने की फसल, झाड़ियां और जंगल एक-दूसरे से जुड़े हैं। तेंदुए के लिए यह इलाका छिपने, शिकार करने और फिर सुरक्षित जंगल तक लौटने के लिए अनुकूल है। दिन में खेतों या झाड़ियों में छिपे रहने के बाद शाम ढलते ही तेंदुए की गतिविधियां बढ़ती हैं।
ऐसे में जंगल से गांव तक आने वाले रास्तों की पहचान और निगरानी बेहद जरूरी है। अब सवाल केवल यह नहीं कि हमला करने वाले तेंदुए को पकड़ा जाए। सवाल यह भी है कि वह गांव तक पहुंचा किस रास्ते से और वापस जंगल में किस रास्ते से गया?
रैनी जंगल से बलिया की ओर आने वाली खेत की मेड़ों, झाड़ियों, नालों और पगडंडियों पर ट्रैप कैमरे लगाए जाएं तो तेंदुओं की आवाजाही का पैटर्न सामने आ सकता है।
नियमित गश्त से यह भी पता चल सकता है कि कौन से रास्ते रात में तेंदुए के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रहे हैं। विरमो देवी की मौत से शुरू हुआ खौफ मिथलेश की मौत तक पहुंच गया है। नरपत सिंह पर हमला इस खतरे की तीसरी बड़ी चेतावनी है।
रैनी का छह हजार हेक्टेयर का जंगल
बिजनौर की धामपुर रेंज का रैनी वन ब्लाक करीब छह हजार हेक्टेयर यानी लगभग 60 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह रैनी नदी के दोनों ओर स्थित है और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
वर्ष 2025 में भी वन विभाग ने यहां पर्यटन की संभावनाएं तलाशने की बात कही थी। यहां तेंदुओं के अलावा भालू, हिरन, जंगली सूअर, नीलगाय और पैंगोलिन जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं।
पक्षियों की भी बड़ी विविधता है। यानी जिस जंगल को ग्रामीण खतरे के रूप में देख रहे हैं, वह वास्तव में वन्यजीवों का महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास भी है। समस्या जंगल के अस्तित्व की नहीं, बल्कि जंगल और आबादी के बीच बढ़ते टकराव की है।
मई 2026 में रैनी क्षेत्र में एक साथ तेंदुए के चार शावक देखे गए थे, यदि यह क्षेत्र तेंदुए के प्रजनन और आवागमन के लिए अनुकूल है तो आसपास के गांवों में उनकी मौजूदगी को केवल किसी एक खूंखार तेंदुए से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पूरे क्षेत्र की निगरानी जरूरी होगी।
रामगंगा के खादर क्षेत्र का पूरा अध्ययन किया जा रहा है। बलिया गांव और आसपास के क्षेत्र में वन विभाग पूरी सतर्कता के साथ निगरानी कर रहा है। तेंदुओं की गतिविधियों वाले स्थानों को चिन्हित कर ट्रैप कैमरे, गश्त और निगरानी बढ़ाई जा रही है। ग्रामीणों को भी सावधानी बरतने के लिए जागरूक किया जा रहा है। आवश्यकता के अनुसार पिंजरे लगाकर तेंदुओं को पकड़ने की कार्रवाई लगातार जारी है।
- आदर्श कुमार, वन संरक्षक, मुरादाबाद मंडल
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