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उत्तराखंड से मुरादाबाद पहुंचे तेंदुए, 4 मौतों के बाद भी 50+ तेंदुओं की दहशत, गन्ने की फसल बनी नया ठिकाना

Published: Wed, 09 Sep 2026 07:05 PM (IST)

मुरादाबाद में उत्तराखंड से आए तेंदुओं ने गन्ने के खेतों को अपना नया ठिकाना बना लिया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष ...और पढ़ें

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HighLights

  1. 2012-13 में कांठ के कोटा गांव से शुरू हुआ सिलसिला

जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। नौ नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तरांचल बना और एक जनवरी 2007 को इसका नाम उत्तराखंड हुआ। राज्य बंटा तो प्रशासनिक सीमाएं भी बदल गईं, लेकिन जंगलों में वन्यजीवों की आवाजाही के लिए कोई सरहद नहीं बनी। बिजनौर का अमानगढ़ क्षेत्र और उत्तराखंड का जिम कार्बेट क्षेत्र आज भी एक-दूसरे से जुड़े वन्यजीव गलियारे का हिस्सा हैं।

इन्हीं रास्तों के जरिए तेंदुओं ने मुरादाबाद के जंगलों तक पहुंच बनाई और परिवार बढ़ाता रहा। शुरूआत में वन विभाग चुप्पी साधकर बैठा रहा। अब इनसे निजात के लिए तरीके खोज रहा है।

मुरादाबाद में तेंदुओं की मौजूदगी का सिलसिला करीब डेढ़ दशक पहले वर्ष 2012-13 में शुरू हुआ। कांठ के कोटा गांव में पहली बार तेंदुए ने बकरी का शिकार किया था। इसके कुछ दिन बाद ठाकुरद्वारा में रामगंगा नदी के पास एक तेंदुआ मृत मिला।

इसके बाद जंगल और गांवों के बीच तेंदुओं की आवाजाही लगातार बढ़ती गई। तेंदुओं को यहां गन्ने के खेतों के रूप में नया सुरक्षित ठिकाना मिला। ऊंची और घनी गन्ने की फसल उन्हें जंगल जैसा आवरण देती रहीं।

खेतों में छिपने की जगह के साथ आसपास बकरी, कुत्ते और अन्य छोटे पशु आसान शिकार भी मिल जाता है। यही वजह है कि जंगलों से निकलकर तेंदुओं ने गन्ने के खेतों को अपना आशियाना बना लिया।

जंगलों में तेंदुओं की आधिकारिक गणना नहीं हुई है, लेकिन वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक अभी भी 50 से अधिक तेंदुओं की मौजूदगी का अनुमान है। मानव-वन्यजीव संघर्ष के दौरान तेंदुए के हमलों में अब तक चार लोगों की जान जा चुकी है।

तीन अगस्त को ठाकुरद्वारा के लालापुर पीपलसाना में संतोष देवी, 18 अगस्त को बलिया में विरमो देवी, 25 अगस्त को इसी गांव की मिथलेश देवी और 29 अगस्त को दिव्यांग जगराज सैनी की तेंदुए के हमले में मौत हुई।

इन मौतों के बाद चले अभियान में अब तक 12 तेंदुओं को पकड़ा जा चुका है। इसके बावजूद ठाकुरद्वारा और आसपास के गांवों में दहशत कायम है। किसानों के लिए सहारा बनी गन्ने की फसल अब सुरक्षा की चुनौती बन चुकी है।

विशेषज्ञों ने दिए समाधान

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि तेंदुओं की लगातार बढ़ती आवाजाही को रोकने के लिए संवेदनशील गांवों और गन्ने के खेतों को चिह्नित कर अभियान चलाते रहना होगा। पिंजरे लगाकर तेंदुओं को पकड़ने की कार्ययोजना पर आगे कार्रवाई जारी रहे।

पकड़े गए तेंदुओं का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन और सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास जरूरी है। इसके लिए स्थायी रेस्क्यू सेंटर बनाया जाए। साथ ही खेतों में निगरानी, कैमरा ट्रैप और ग्रामीणों को जागरूक कर मानव-वन्यजीव संघर्ष कम किया जा सकता है।

 

तेंदुओं की गतिविधियों वाले क्षेत्रों में वन विभाग लगातार निगरानी कर रहा है, जहां जरूरत होती है, वहां पिंजरे लगाकर तेंदुओं को रेस्क्यू किया जाता है। ग्रामीणों को भी सतर्क रहने के लिए जागरूक किया जा रहा है। तेंदुओं की संख्या और गतिविधियों को समझने के लिए निगरानी व्यवस्था और मजबूत की जाएगी।

- आदर्श कुमार, वन संरक्षक

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