मुरादाबाद। बहुचर्चित बावनखेड़ी कांड के पर्दाफाश में पुलिस को हर कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पूरी तरह गूंगे मुकदमे में दीवार ने चश्मदीद गवाह जैसी भूमिका निभाई।

केस हिस्ट्री के लिहाज से परिवार के सात लोगों के कत्ल बाद परिवार की इकलौती बेटी शबनम ही इकलौती बची थी। वही चश्मदीद गवाह हो सकती थी, जिस भूमिका में उसने पहली सूचना के दौरान छत के रास्ते घर में लुटेरों के दाखिल होने और पूरे परिवार को कत्ल करने की जानकारी दी। सबको गवां चुकी एक लड़की के गम तो लेकर जहां पूरा इलाका गमगीन था, वहीं शबनम से सहानुभूति और बड़े अपराध पर सिस्टम से गिला हर चेहरे पर दिख रहा था। लड़की होने के नाते और अपनों को गंवाने के दर्द के चलते पुलिस शबनम से घटनाक्रम को लेकर ज्यादा सवाल भी नहीं कर पा रही थी। ऐसे में पुलिस को बेजुबान दीवार और घर से ही तफ्तीश आगे बढ़ाकर असलियत से परदा हटाना था।

विवेचना संभाले तत्कालीन इंस्पेक्टर हसनपुर आरपी गुप्ता ने इसी शस्त्र का सहारा लिया। लुटेरे-हत्यारों के आने का रास्ता बताई जा रही छत के पिछवाड़े देखा तो जमीन और छत में 14 फुट की ऊंचाई थी। सीढ़ी लगाने जैसे संकेत नहीं थे और दीवार पर छत से बरसाती पानी नीचे लाने के लिए पाइप के अलावा कोई सहारा नहीं था। दीवार को गहनता से देखने पर चढ़ने-उतरने की कोशिश के कोई निशान हाथ नहीं आए। दूसरा वारदात के बाद घर में घुसे आसपास के लोगों ने आंगन में खुलने वाले जीने का दरवाजा बंद बताया। जांच अधिकारी के दिमाग में सवाल कौंधा कि घर में इतनी बड़ी वारदात की जानकारी के बाद शबनम जीने का दरवाजा बंद करने की स्थिति में हो नहीं सकती, फिर दरवाजा किसने बंद किया।

यहां से उठे शक पर मुहर लगाई पोस्टमार्टम ने जिसमें सभी शवों के उदर का असल भाग लाल रंग का मिला जो जहर या भारी नशे के कारण ही हो सकता है।

अपने घर में रात का खाना खाकर सुरक्षित तरीके से सभी के सोने के संकेत साफ थे-ऐसे में दूसरा सवाल उठा कि परिवार को जहर या नशा किसने दिया और अगर सामान्य खाने-पीने में ऐसा कोई अंश था तो उसका असर शबनम पर क्यों नहीं हुआ। इससे आगे की राह आसान की फोन कॉल डिटेल ने। वारदात की रात शबनम-सलीम के बीच 52 दफा फोन वार्ता का रिकार्ड हाथ आया, जबकि इस बीच गम व बदहवासी से बार-बार बीमार बताई जा रही शबनम के इलाज की कोशिशों में खामोशी से कराए गए मेडिकल ने उसके गर्भवती होने की पोल भी खोल दी।

इसके बाद पुलिस ने सलीम को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो वह धीरे-धीरे टूटता गया और तफ्तीश मजबूत होती चली गई। इस तरह 'गूंगे गवाहों' के सहारे मात्र तीन-चार दिन के अंतराल में 18 अप्रैल को इस कांड का पर्दाफाश करने में कामयाबी हासिल कर ली गई।

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हर कदम थी चुनौती

मुरादाबाद : पुलिस से सेवानिवृत्त हो चुके तत्कालीन इंस्पेक्टर हसनपुर आरपी गुप्ता मानते हैं कि इस केस में हर कदम पर चुनौती थी। उन्होंने बताया कि घटना के बाद आक्रोशित जनता के सड़कों पर आने से हसनपुर के तत्कालीन इंस्पेक्टर बाबूराम सागर को निलंबित कर मुझे अमरोहा से हसनपुर तैनात किया गया। इससे दबाव और बढ़ गया। जानकारी देने वाली शबनम से ज्यादा पूछताछ या दबाव भी नहीं बनाया जा सकता था। इस विभाग, समाज और परिस्थिति के दबाव के बीच एक-एक कदम फूंककर रखना पड़ा। सही खुलासा होने के बाद भी जान में जान आई।

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जज ने सराहा, पुलिस महकमे ने की उपेक्षा

मुरादाबाद : इतनी बड़ी वारदात का इतनी जल्दी खुलासा करने में हीरो जैसी भूमिका निभाने वाले तत्कालीन इंस्पेक्टर आरपी गुप्ता को जिला जज ने सफल विवेचक की भूमिका में विशेषतौर पर सराहा। शबनम-सलीम को फांसी की सजा सुनाने वाले अमरोहा के तत्कालीन जिला जज ने श्री गुप्ता के हक में प्रशस्ति पत्र भी जारी किया। अदालत ने इसकी कापी डीजीपी तक भी भेजी लेकिन पुलिस ने लिए गौरव बने इस खुलासे में पुलिस ने अपनी टीम के नायक को कोई सम्मान नहीं दिया।

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खुलासे की जल्दी से बची मुआवजा एलान की जल्दबाजी

मुरादाबाद : बंद घर में सात लोगों के कत्ल की गूंज से पूरा सूबा हिला तो तब मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाले मायावती तीसरे ही दिन बाबनखेड़ी पहुंचीं। जनाक्रोश व गम के हालात देख उन्होंने जहां जल्द पर्दाफाश के निर्देश दिए, वहीं हमदर्दी का पात्र बनी शबनम को पांच लाख मुआवजे की घोषणा भी कर दी। तब तक शबनम-सलीम को शक के दायरे में लेकर खुलासे की आउटलाइन तैयार कर चुकी पुलिस ने फौरन ही मुआवजा न देने की राय लखनऊ भेजी। इससे मुख्यमंत्री सचिवालय सहमत नहीं हुआ, जिन्हें बमुश्किल दो दिन इंतजार के लिए रजामंद किया गया। बाद शबनम की असलियत सामने आने पर सीएम टीम की अफसरशाही को लगा कि मुआवजे के एलान में जल्दबाजी की गई थी।

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