पाकिस्तान से नेपाल तक विंध्याचल के पुरोहितों से जुड़ा है राजघरानों का नाता, पीढ़ियां बदलीं... पर नहीं टूटी परंपरा
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के बहीखातों में लाहौर के कश्मीरी पंडितों से लेकर नेहरू-गांधी परिवार और राजघरानों तक के आगमन का विवरण दर्ज है।

मां विंध्यवासिनी।
HighLights
लाहौर के कश्मीरी पंडितों का विंध्याचल आगमन दर्ज।
नेहरू-गांधी परिवार का विंध्याचल से पुराना धार्मिक संबंध।
राजघरानों और नेपाल के शाही परिवार का भी नाता।
जागरण संवाददाता, मीरजापुर। सरहदें बदलीं, रियासतें इतिहास बन गईं, लेकिन विंध्याचल में आस्था के रिश्ते कायम रहे। पाकिस्तान के लाहौर के कश्मीरी पंडितों से लेकर नेहरू-गांधी परिवार और राजा-महाराजाओं तक का नाता मां विंध्यवासिनी के दरबार से जुड़ा रहा है।
यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास सुरक्षित बहीखातों में इन यजमानों के आगमन और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विवरण दर्ज होने की बात कही जाती है। पुरोहितों के अनुसार, उनके पास 14वीं शताब्दी तक के यजमानों का विवरण उपलब्ध है।
लाहौर के कश्मीरी पंडित भी आए थे दर्शन करने
पुरोहितों के बहीखाते में लाहौर के चौक बाजार निवासी पंडित कृष्ण लाल शास्त्री, पंडित दिल्ली दरवा और पंडित लक्ष्मी राम, पुत्र गणेश कौल के नाम दर्ज बताए जाते हैं। ये लोग संवत 1968 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे। इनके तीर्थ पुरोहित रामजी पांडेय थे। उनके वंशज आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी भी पहुंचे थे विंध्याचल
नेहरू-गांधी परिवार का भी विंध्याचल से पुराना धार्मिक संबंध रहा है। पुरोहितों के विवरण के अनुसार, मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी संवत 1979 में मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे।
इसके बाद परिवार की अगली पीढ़ियों के सदस्यों के आगमन का भी उल्लेख मिलता है। राजन नेहरू वर्ष 1962 में, इंदिरा गांधी 4 अप्रैल 1980, 17 मई 1981 और 10 जून 1981 को, सोनिया गांधी 20 फरवरी 2002 तथा राहुल गांधी 2 नवंबर 2011 को विंध्याचल आए थे।
इन आगमन विवरणों से जुड़े पुरोहित के रूप में रामजी पांडेय का नाम बताया गया है। उनके वंशज इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

1987 में राजा क्षत्रशाल सिंह ने किए थे दर्शन
राजपरिवारों और विंध्याचल के पुरोहितों के संबंधों की एक कड़ी वर्ष 1987 से जुड़ी है। उस वर्ष राजा क्षत्रशाल सिंह मां विंध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आए थे। शेरपुर कोठी के पुरोहित मिट्ठू मिश्रा के परिवार के सदस्यों ने उन्हें दर्शन-पूजन कराया था।
नेपाल के राजपरिवार सहित अन्य राजघरानों के सदस्यों के भी विंध्याचल आने की जानकारी पुरोहित परिवारों की ओर से दी जाती है। नेपाल के राजपरिवार से जुड़े पुरोहितों में तरुण पांडेय, छेरहा घराना और मृत्युंजय पांडेय के नाम बताए जाते हैं।

पीढ़ियों का इतिहास
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहितों के बहीखाते केवल यजमानों के नाम दर्ज करने तक सीमित नहीं हैं। इनमें परिवारों, उनके मूल निवास और तीर्थयात्रा से जुड़े विवरण भी मिलते हैं।
इन अभिलेखों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में विंध्याचल आने वाले परिवारों और उनके पुरोहितों के संबंधों का इतिहास समझा जा सकता है। राजशाही के दौर से लेकर आधुनिक समय तक चले आ रहे ये संबंध विंध्याचल की तीर्थ परंपरा की निरंतरता को सामने लाते हैं।
