विंध्य के हुनर से चमकेगी प्रभु श्रीराम की तपोभूमि, चित्रकूट भेजे गए एक लाख दीये
मीरजापुर के कुम्हारों द्वारा बनाए गए दीये इस दीपावली भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट को रोशन करेंगे, जिससे उनकी पारंपरिक ...और पढ़ें
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HighLights
मीरजापुर से एक लाख दीये चित्रकूट भेजे गए, रोशन होगी तपोभूमि।
कुम्हारों के लिए दीपावली बनी आत्मनिर्भरता और रोजगार का पर्व।
स्थानीय हुनर और 'लोकल फॉर वोकल' पहल को मिला बढ़ावा।
कमलेश्वर शरण, मीरजापुर। भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट इस दीपावली विंध्य की मिट्टी से बने दीये से जगमगाएगी। जिन हाथों में पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देने का हुनर है, उन्हीं हाथों से तैयार दीये अब विंध्य की सीमा पार कर चित्रकूट तक पहुंच रहे हैं।
यह कारोबार के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों के बीच आस्था का जुड़ाव और स्थानीय हुनर की बढ़ती स्वीकार्यता भी है। दीये की लौ जहां सनातन परंपरा के तमसो मा ज्योतिर्गमय संदेश को जीवंत करेगी, वहीं कुम्हारों के घरों में आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद भी रोशन होगी।
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा केवल घरों को सजाने तक सीमित नहीं है। यह अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीराम के वनवास से लौटने की स्मृति से जुड़ा दीपोत्सव हो या मंदिरों में आरती और पूजा-अर्चना, मिट्टी के दीपक सनातन संस्कृति की अभिन्न पहचान हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश राज्य के चित्रकूट जैसे धार्मिक महत्व वाले क्षेत्र तक विंध्य के दीपकों की मांग कुम्हारों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला है।
चाक पर आकार ले रही आत्मनिर्भरता
दीपावली नजदीक आते ही कुम्हारों के घरों में चाक की रफ्तार तेज हो गई है। मिट्टी को गूंथने से लेकर दीये बनाने, सुखाने और पकाने तक परिवार के सदस्य जुटे हैं। स्थानीय बाजार के साथ दूसरे जिलों से भी आर्डर मिलने से कारीगरों को अपनी मेहनत का दायरा बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।
शहर में एक हजार से अधिक लोग माटीकला से जुड़े हैं। इनके लिए दीपावली सिर्फ त्योहार नहीं, रोजगार और पारिवारिक आय और पीढ़ियों से सहेजी कला को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर भी है।
माटीकला से जुड़े हैं एक हजार से अधिक लोग, हर रोज बना रहे 20 हजार दीये
चाक पर घूमती मिट्टी सिर्फ दीये नहीं गढ़ रही, स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर भी संवार रही है। दीपावली पर मिट्टी के दीयों की बढ़ी मांग ने कुम्हारों के पारंपरिक कारोबार में नई उम्मीद जगाई है। दीया बनाने में जुटीं प्रिया प्रजापति ने बताया कि अभी एक लाख दीये चित्रकूट भेजे गए हैं। इस बार करीब 10 लाख दीये जनपद से बाहर भेजे जाएंगे।
पिछले साल सात लाख दीये जिले से बाहर भेजे गए थे। ऐसे में इन दिनों शहर में हर रोज 20 हजार से अधिक दीये तैयार किए जा रहे हैं। दीये थोक में 25-30 रुपये सैकड़े तो फुटकर में 40 से 60 रुपये सैकड़े बिक रहे हैं। मिट्टी के दीयों की मांग साल-दर-साल बढ़ने और दूसरे राज्यों से भी आर्डर मिलने से इस पारंपरिक कारोबार का दायरा बढ़ा है।
दीये की लौ संग कारीगरों की उम्मीदें भी चमकेंगी
विंध्याचल के पुरोहित दीनबंधु मिश्र बताते हैं कि मिट्टी के दीये आज भी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता बनाए हुए हैं। इनकी लौ में केवल तेल और बाती का प्रकाश नहीं, कुम्हारों की मेहनत, परंपरा और स्वावलंबन की कहानी भी समाई है। इस दीपावली विंध्य के चाक पर तैयार दीपक चित्रकूट की धर्मनगरी को रोशन करेंगे तो उनके साथ यहां के कारीगरों की उम्मीदें भी दूर तक चमकेंगी।
लोकल फार वोकल को मिल रहा संबल
विंध्य के कुम्हारों के बनाए दीपकों की चित्रकूट तक पहुंच इस बात का संकेत है कि स्थानीय उत्पादों में बाजार की संभावनाएं बढ़ रही हैं। अपने क्षेत्र के हुनर, श्रम और उत्पाद को प्राथमिकता देना। यही लोकल फार वोकल की असली भावना है। इससे आत्मनिर्भर भारत का संकल्प भी मजबूत हो रहा है।
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