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मेरठ, जेएनएन। परमात्मा के द्वारा रचित यह संसार जैविक तथा अजैविक रूप से दो भागों में विभक्त है। जैविक संघटकों में मानव तथा अन्य प्राणियों सहित जीवनोपयोगी अन्य पदार्थो का भी ग्रहण होता है। मानव व अन्य प्राणियों का जीवनयापन सुचारु एवं व्यवस्थित ढंग से हो सके, इस उद्देश्य से परमदयालु, करुणाकर, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वाधार परमपिता परमात्मा ने प्राणी संरचना से पूर्व ही उन पदार्थो की संरचना कर व्यवस्था की, जो उनके लिए आवश्यक हों। जिस प्रकार माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य, नवागंतुक शिशु की व्यवस्थाओं की पूर्व कल्पना, चिंतन आदि करते हैं। उसी प्रकार ईश्वर ने भी संसार में सभी उपयुक्त पदार्थो की व्यवस्था की, क्योंकि परमपिता परमात्मा हमारा बंधु, माता-पिता अर्थात सब कुछ है।
अग्नि के बाद आई पर जल अधिक महत्वपूर्ण
परमात्मा की यह सूक्ष्म व्यवस्था हमें कृत कृत्य भावना से प्रपूरित है। इन मानवोपयोगी पदाथरे का विवेचन किया जाए तो, प्रत्येक पदार्थ, वृक्ष, वन, औषधि, वनस्पति, जल, अग्नि, वायु आदि मुख्य हैं। मानव के शरीर का निर्माण प्रकृत के पंच महाभूत, जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी व आकाश से होता है। हमारे वेदादि शास्त्रों ने जल की महत्ता को एक स्वर से स्वीकार किया है। सृष्टि निर्माण प्रक्रिया में भी अग्नितत्व के पश्चात जल तत्व का ही स्थान आता है। यानी अग्नि से जलोत्पत्ति हुई है।
वेदों ने भी बताया है जल का महत्व
वैसे तो मानव जीवन परमात्मा निर्मित सभी तत्वों पर आश्रित है, किंतु उसमें जल तत्व का अपना मुख्य विशिष्ट स्थान होता है। जल के आधार भूत संपूर्ण मानव सृष्टि है। जल के महत्व को वैदिक कालावधि से लेकर आज तक सभी ने एक मत से स्वीकार किया है। जल न केवल पीने के लिए अपितु औषधि आदि रूप में भी प्रयोग किया जाता रहा है। यजुर्वेद के ऋषि ने कहा कि जल समस्त रोगों की औषधि है। वेदों में तो कतिपय पदार्थो को पेय है, पीने योग्य है, उन्हें सभी को जल रूप में स्वीकार किया है। जल की सुरक्षा आदि काल से ही हमारे महान पूर्वजों ऋषि, वैदिक संतों के द्वारा की जाती रही है। मनुष्य अब कितना भी आलसी हो गया हो पर जल तत्व की सुरक्षा सदा से ही उसे आंदोलित करती रही है।
जीवन की जरूरत को नष्ट कर रहा मनुष्य
इस उपयोगी एवं महत्वपूर्ण तत्व को आज का मानव अंधाधुंध तरीके से नष्ट कर रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा जलस्वरूप सर्वाधिक नष्ट हो रहा है। जल में बढ़ रही रेडियोधर्मिता के कारण कतिपय लोग काल कवलित हो गए। नगरीय क्षेत्र हों या ग्रामीण क्षेत्र जल सुरक्षा का ध्यान बहुत कम ही लोगों के मन में रहता है। मांसाहार वैसे तो रोगोत्पत्ति, कैंसर आदि का प्रमुख कारण है किंतु जल का विनाश इस कारण से भी अधिक होता है। वाशिंग मशीन परंपरा भी जल नष्ट करने का एक प्रमुख कारण बनती जा रही है। निर्थक बहते हुए जल को रोकने के लिए मानव अंक चेतना विहीन हो जाते हैं। यदि मनुष्य अपनी इस सवरेपयोगी धरोहर की सुरक्षा का दायित्व लें तो हम आने वाली भयावह स्थिति से बच सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध जल समस्या को लेकर होगा। ऐसी स्थिति से बचने के लिए हमें हमारे वैदिक सिद्धांतों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। वर्तमान में हो रही अतिवृष्टि व अनावृष्टि आदि दोषों का निवारण भी हमारे संकल्प से ही होगा। हमारे ऋषिगण यज्ञादि विधाओं द्वारा जल एवं प्रकृति के अन्य पदार्थो को सुरक्षा प्रदान करते आ रहे हैं। वेदों के साथ-साथ पुराणों में भी जल संरक्षण के कतिपय प्रमाण उपलब्ध होते हैं। जल में थूकना, मल-मूत्र त्यागना, कूड़ा व पूजा के बाद फूल-पत्तों को पानी में फेकना, अस्थिविसर्जन करना, मूर्ति विसर्जन आदि से जल में रसायनिक रंगों को डालना आदि पापकर्म के अंतर्गत आता है। ऋषियों का एक मात्र उद्देश्य यही था कि जल तत्व को सबसे अधिक सुरक्षा प्रदान की जा सके।
क्योंकि जल ही जीवन है...
इन्हीं सत्य सनातन वैदिक परंपराओं को आधार बनाकर वैदिक ऋषि पद्धति एवं आधुनिक शिक्षा के समन्वयक डीएवी संस्थानों द्वारा जल संरक्षण कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन के रूप में शुरू किया गया है। भारत सरकार की गंगाशुद्धि कार्यक्रम नमामि गंगे के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं। इसी जल संरक्षण आंदोलन के अंतर्गत ही विद्यालयों में भूगर्भ वर्षा जल संरक्षण इकाई की स्थापना कुछ दिनों पहले की गई। जल के महत्व को लोगों तक पहुंचाने के लिए विद्यालय के शिक्षक एवं छात्रों का योगदान भी मिल रहा है। बिन जल के यह धरती बिलकुल सूनी हो जाएगी। इसकी सुरक्षा, संरक्षण, संवर्धन हमारा नैतिक की नहीं अपितु धार्मिक कर्तव्य भी है। आइए जल की सुरक्षा के लिए हम सब मिलकर कदम बढ़ाते हैं।
- डा. अप्‍लना शर्मा, प्र‍िंसिपल, सीजेडीएवी सेंटेनरी पब्‍ल‍िक स्‍कूल 

Posted By: Taruna Tayal

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