मेरठ, जेएनएन। सीबीएसई की तर्ज पर एक समान पाठ्यक्रम करने के उद्देश्य से यूपी बोर्ड में एनसीईआरटी की किताबें लागू कर दी गईं, लेकिन सामाजिक विज्ञान का पाठ्यक्रम अरुचिकर होने संबंधी शिकायतों और सुझाव के चलते इसमें बदलाव होने जा रहा है।

प्रदेश की योगी सरकार ने एक समान पाठ्यक्रम करने और पुस्तकों में चलने वाली कमीशनबाजी को रोकने के लिए यूपी बोर्ड में भी एनसीईआरटी की किताबें लागू कर दी थी। शैक्षिक सत्र 2018-19 में सभी विषयों में एनसीईआरटी की किताबें लागू हुईं। इसके बाद से ही सामाजिक विज्ञान विषय को लेकर शिकायतें आने लगीं। सालों से सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षकों ने परिषद व मुख्यमंत्री कार्यालय को बताया कि एनसीईआरटी के सामाजिक विज्ञान का पाठ्यक्रम बहुत गूढ़ और अरुचिकर होने के कारण छात्र इस विषय को पढ़ने में रुचि कम दिखा रहे हैं।

बच्चों के स्तर का नहीं पाठ्यक्रम

माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की किताबें बच्चों के स्तर को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई हैं। बहुत से पाठ पीएचडी की थीसिस से लिए गए हैं जो बच्चों के लिए ज्यादा गंभीर व अरुचिकर हैं। इसीलिए शिक्षकों की मांग पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने माध्यमिक शिक्षा परिषद से पाठ्यक्रम समिति में इस पर विचार करने को कहा है। यूपी बोर्ड सचिव ने मुख्यमंत्री कार्यालय को जल्द ही होने जा रही पाठ्यक्रम समिति की बैठक में इस पर निर्णय लेने की जानकारी दी है।

इनका कहना है..

-18 सालों से सामाजिक विज्ञान विषय पढ़ाते हुए बच्चों में इस विषय के प्रति ऐसा खराब रुझान देखने को नहीं मिला। यूपी बोर्ड का पाठ्यक्रम क्रमबद्ध, रुचिकर और विस्तृत होने के कारण इसे ही लागू किया जाना चाहिए।

-राजेश कुमार त्यागी, सामाजिक विज्ञान शिक्षक, केकेइंटर कालेज -एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की किताब में इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र का समन्वय है। कुछ बिंदु आठवीं में ही दिए गए, जिसे नौवीं और 10वीं में विस्तार दिया गया है। एनसीईआरटी की किताब वर्तमान परिदृष्य को समझने के लिए अच्छी है।

-अनु दास, शिक्षिका, एसएसटी, ट्रांसलेम एकेडमी

Edited By: Jagran