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सहारनपुर में तत्कालीन प्रमुख सचिव व डीएम के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज, जानें वजह

एडवोकेट राजकुमार ने बताया कि शब्बीरपुर निवासी दल सिंह ने विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट वीके लाल की अदालत में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया था कि वह शब्बीरपुर दंगे का पीडि़त है। इस संबंध में थाना बडग़ांव में मुकदमा पंजीकृत है।

By Prem BhattEdited By: Published: Sat, 17 Oct 2020 01:39 AM (IST)Updated: Sat, 17 Oct 2020 06:50 AM (IST)
सहारनपुर में राजद्रोह में तत्‍कालीन डीएम और प्रमुख सचिव के खिलाफ राजद्रोह में मुकदमा दर्ज हुआ।

सहारनपुर, जेएनएन। तीन वर्ष पूर्व बडग़ांव थानाक्षेत्र के गांव शब्बीरपुर में हुए जातीय दंगे में अनुसूचित जाति के पीडि़तों को एससी-एसटी एक्ट की धाराओं के मुताबिक लाभ न दिए जाने के मामले में एससी-एसटी की विशेष अदालत ने तत्कालीन प्रमुख सचिव समाज कल्याण मनोज कुमार व तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार पांडेय के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह व एससी-एसटी एक्ट में परिवाद दर्ज कर सुनवाई की तिथि 19 नवंबर निर्धारित की है।

एडवोकेट राजकुमार ने बताया कि शब्बीरपुर निवासी दल सिंह ने विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट वीके लाल की अदालत में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया था कि वह शब्बीरपुर दंगे का पीडि़त है। इस संबंध में थाना बडग़ांव में मुकदमा पंजीकृत है। जिला समाज कल्याण विभाग की ओर से उसे तीन लाख रुपये दिये गए थे, जबकि जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज है उनमें 8.25 लाख रुपये का अनुदान और 5 हजार रुपये महीने की मूल पेंशन के साथ महंगाई भत्ता दिए जाने का प्रावधान था।

यही नहीं पीडि़त के बच्चों की स्नातक स्तर तक शिक्षा का पूरा खर्च, उनका भरण पोषण, सरकार द्वारा पूर्णत: वित्त पोषित आश्रम व आवासीय स्कूलों में दाखिला दिए जाने का प्रावधान था। जिलाधिकारी अखिलेश सिंह ने पेंशन व अन्य सुविधाएं दिए जाने के संबंध में 17 जून 2020 को प्रमुख सचिव समाज कल्याण को पत्र लिखकर इस संबंध में मार्गदर्शन मांगा था। परंतु इस पत्र का आज तक जवाब नहीं आया है।

विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट वीके लाल ने अपने आदेश में कहा है कि एससीएसटी एक्ट की धारा-4 एवं महामहिम के आदेशों की स्पष्ट अवमानना देशद्रोह की श्रेणी का अपराध किया है।

तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार पांडेय एवं प्रमुख सचिव समाज कल्याण मनोज ङ्क्षसह ने संसद द्वारा पारित और राष्ट्रपति द्वारा जारी राजाज्ञा का उल्लंघन किया है। यह अनुसूचित जाति के लोगों को नुकसान पहुंचाने की नीयत से जानबूझकर किया गया अपराध है। इस संबंध में पुलिस द्वारा विवेचना कराया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है बल्कि स्वयं न्यायालय द्वारा जांच किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। न्यायालय ने दोनो के विरुद्ध मामला परिवाद के रूप में दर्ज कर 19 नवंबर को सुनवाई की तिथि निर्धारित की है। 


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