मेरठ। बुधवार की दोपहर शहर पर धूप और उमस तारी थी। इस उचाट मौसम में संगीत की बदली से सुरों की झमाझम बारिश हुई। शिवांगी संस्थान में होनहार कलाकारों ने कला के आसमान पर गायन, वादन और नृत्य का इंद्रधनुष उकेर दिया। उन्होंने जताया कि आखिर भारतीय शास्त्रीय संगीत किस प्रकार प्रकृति के साथ आंखमिचौली करती हुई चमत्कारी बन पड़ता है।

शिवांगी संगीत महाविद्यालय में बुधवार को सरगम कार्यक्रम के अंतर्गत संगीत की महफिल जमी। संस्थान की निदेशिका ऋचा शर्मा ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया। युवा कलाकारों की तैयारी परखने के इरादे से आयोजित कार्यक्रम में हुनर का अखाड़ा लगा। तपती दोपहर के बीच ऐश्वर्या सिंह ने राग भैरव पेश कर भोर का अहसास कराया। उनकी प्रस्तुति में खयाल गायकी की गहरी समझ और सुरों पर सटीक पकड़ नजर आई। तीन ताल में निबद्ध विलंबित व द्रुत खयाल पेश कर ऐश्वर्या ने गुरु का आशीर्वाद हासिल किया। स्वरों का विस्तार, आलाप और मोहक तानों से उन्होंने सुधी श्रोताओं का मन मोह लिया। इसके बाद श्रुति अग्रवाल ने राग बागेश्री में खयाल और तराना की आकर्षक प्रस्तुति की। राग के स्वर विस्तार में उनकी तैयारी हैरान करने वाली थी। उनकी सटीक तानों से युवा पीढ़ी सीख सकती है। संगीत गुरु व महाविद्यालय के प्राचार्य राजा बालूनी की सधी निगरानी में होनहार कलाकारों ने संगीत की गंगा का अवतरण कराया।

भंगिमाओं के शिखर पर नृत्य साधना

संगीत की सुर लहरियों के थमने के बाद अब बारी नृत्य की थी। युवा कलाकार प्रियांशी यादव ने कथक नृत्य के अंतर्गत विलंबित व दु्रत लय में चाला के जरिए लयकारी दिखाई। तबले की थाप और घुंघरुओं की छमछम के साथ नृत्य की भंगिमाएं भी एकाकार होती नजर आई। पहले पखावज से परन बजाई जाती थी, किंतु इसकी जगह अब तबले ने ले ली है, और मोहम्मद फारुख ने इसे बखूबी निभाया। कवित्त, तिहाई और लड़ी की प्रस्तुति प्रभावशाली रही। अंत में ठुमरी-'माको राको न रे सांवरिया' की मनमोहन प्रस्तुति से उन्होंने गुरुजनों का सम्मान बढ़ाया। प्रेरणा शर्मा ने चारताल में निबद्ध शिवस्तोत्र व शुद्ध पारंपरिक कथक नृत्य की तालबद्ध प्रस्तुति की। उन्होंने राधा-कृष्ण के बीच मोहन और वियोग के क्षणों को भावों में ढाला।

जयपुर घराने का गाढ़ा रंग

अदिति भारद्वाज ने धमारताल एवं धु्रपद के अंतर्गत विशिष्ट हस्तमुद्राओं एवं पद संचालन में जयपुर घराने की लयकारी दिखाकर लोगों को दंग कर दिया। चूंकि जयपुर घराने की कला में भक्ति रस प्रधान तत्व है, जिसका पूरा खयाल रखा। दादरा ताल में निबद्ध 'डमरू हरकर बाजे' में अदिति ने भगवान शिव के मौन और रौद्र दोनों रूपों को साकार किया। उनकी पैरों की गति ने तैयारी पर मोहर लगा दी। अंत में पद्मश्री नर्तक राजेंद्र गंगानी व रुचि बलूनी की शिष्या ईप्सा नरूला ने फुटवर्क से जयपुर घराने के फन को नया विस्तार दिया। तीन ताल में उन्होंने तमाम जाति की बंदिशों को पेश किया। दादरा ताल में 'काहे को मोरी बइयां गहोरी' की भावपूर्ण प्रस्तुति संगीत के आसमान में धु्रवतारे की मानिंद चमकी। कार्यक्रम में निदेशिका ऋचा शर्मा, रुचि बलूनी, वंदना, मंजू शर्मा, रंजीता, ईशिका, उत्तम गोस्वामी व शैलेंद्र सिंह का विशेष योगदान रहा।

Posted By: Jagran

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