मेरठ (दुर्गेश तिवारी)। देश के प्रमुख बैंक आज एनपीए के चलते कराह रहे हैं। अर्थव्यवस्था जरूर मजबूती का संकेत दे रही है, लेकिन बैंकों की हालत खस्ता है। बैंकों की जर्जर स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सुखद संकेत नहीं हैं। बैंकों का एनपीए कैसे कम हो? दैनिक जागरण की सोमवार की अकादमिक संगोष्ठी में में भी 'खराब दौर से कैसे बाहर निकलें बैंक' विषय पर विमर्श हुआ। अतिथि वक्ता के रूप में चार्टर्ड एकाउंटेंट अभिषेक गोयल व अंकुर अग्रवाल मौजूद रहे।

अतिथि के विचार

सबसे पहले बैंकिंग प्रणाली को समझना होगा। अर्थव्यवस्था में बैंकिंग सेक्टर का अहम स्थान होता है। बैंकिंग प्रणाली ग्रामीण व शहरी दो भागों में काम करती है। बैंक का उद्देश्य जमा और निकासी की प्रक्रिया को निरंतर चलाना होता है। बैंक ही व्यवसाय का आधार हैं। ऐसे में व्यवसाय को चलाने व बढ़ावा देने के लिए बैंक कर्ज देते हैं। कर्ज देने के बाद बैंक कर्ज की किस्त व ब्याज समयानुसार वसूलते हैं। लेकिन वसूली प्रक्रिया लचर होने पर अक्सर कर्ज फंस जाता है। जिससे बैंकों पर बोझ पड़ने लगता है।

कर्ज देने में नियमों की अनदेखी

बैंक जब किसी को कर्ज देते हैं तो नियमानुसार उस कर्ज के सापेक्ष संपत्ति की जांच की जाती है। यह संपत्ति दो तरह की होती है। पहली प्राथमिक संपत्ति जो संबंधित कर्ज के कार्य को इंगित करती है। दूसरी कोलेटरल या सहायक संपत्ति जो कर्ज वसूली के तत्वों को निर्धारित करती है। कई बार बैंकर्स उपभोक्ता से जान पहचान के चलते इन संपत्तियों की छानबीन किए बगैर कर्ज दे देते हैं जिनसे बाद में वसूली मुश्किल हो जाती है।

एनपीए में फंसा कर्ज

एनपीए के वापस आने की संभावना नगण्य होती है। बैंक मानकों के मुताबिक यदि किसी बैंक खाते में दिए गए कर्ज का ब्याज या किस्त या फिर दोनों 90 दिनों तक जमा नहीं होते तो उस खाते को एनपीए घोषित कर दिया जाता है। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 10 वर्षो में सरकारी बैंकों ने इस्पात, ऊर्जा, कपड़ा और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के लिए कर्ज दिया। आज बैंकों के कुल एनपीए का करीब आधा कर्ज इन्हीं क्षेत्रों में से है।

बैंकों की लाचारी के जिम्मेदार

बैंकों के बढ़ते एनपीए के प्रमुख जिम्मेदार बड़े डिफाल्टर होते हैं। साथ ही वसूली के मानकों की जांच किए बिना उनकों कर्ज देने वाले शाखा प्रबंधक व शीर्ष अधिकारी भी इसमें बराबर के जिम्मेदार होते हैं। चंद बड़े कर्जदारों के चलते बैंकों की वित्तीय स्थिति प्रभावित होती है। उनका एनपीए बढ़ता है, जिसके चलते उनकी कर्ज देने की क्षमता कम हो जाती है।

क्या हो सकते हैं उपाय

-सभी बैंकों की मॉनिट¨रग के लिए एक रेगुलेटरी बोर्ड बनाना होगा। ताकि समयानुसार उनका ऑडिट कराया जा सके।

-व्यवसाय या उद्योगों को कर्ज देते समय कर्ज की राशि के सापेक्ष कोलेटरल संपत्ति को सुनिश्चित करना होगा ताकि कर्ज फंसने की स्थिति में उस संपत्ति से रिकवरी की जा सके।

- कर्ज की रिकवरी में शाखा प्रबंधक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उन्हें कर्ज वसूली में लचरता बरतने से रोकने के उपाय किए जाएं। साथ ही तय समय तक ब्याज व किस्त वसूली करवाने के कड़े नियम बनाए जाएं।

-बैंकों में शाखा प्रबंधक से लेकर शीर्ष स्तर के अधिकारियों के ट्रांसफर व रोटेशन के नियमों का पालन किया जाए।

- कर्ज देने के अधिकार बैंक शाखाओं से ले लिए जाएं। एक समिति बनाई जाए जो सभी तरह के कर्जो की वसूली और देनदारी सुनिश्चित करे।

-प्रत्येक छह साल बाद बैंकों के सी-बिल रिव्यू होते हैं। जिनकी रिपोर्टो में दिए गए कुल कर्ज का स्कोर, कर्ज वसूली की रिपोर्ट तथा कर्ज फंसने की स्थिति में बैंक द्वारा समाधान के तरीके शामिल होते हैं। इस पर विशेष ध्यान दिया जाए। साथ ही इन रिपोर्टो की सत्यता जांचने को कड़े नियम बनाए जाएं।

Posted By: Jagran

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप