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RVC : घोड़े की जान बचाने के लिए 60 से 90 मिनट का फैसला अहम, देरी से दम तोड़ सकती है आंत

By Amit Tiwari Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 01 Nov 2026 06:00 AM (IST)

घोड़ों में सर्जिकल कालिक के उपचार में 60-90 मिनट का समय महत्वपूर्ण होता है, देरी से आंतों को नुकसान हो ...और पढ़ें

आरवीसी सेंटर एंड कालेज के ऐतिहासिक भंडारी हाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दूसरे दिन उपस्थित मुख्य अतिथि एडिशनल क्वार्टर मास्टर जनरल मेजर जनरल विक्रम शर्मा (बाएं से चौथे), रिमाउंट वेटनरी सर्विसेस के आफिशिएटिंग महानिदेशक मेजर जनरल एसएस बालाजी (बाएं से तीसरे), आरवीसी सेंटर एंड कालेज के कमांडेंट मेजर जनरल लक्ष्मीकांत मदरेवर (दाएं से दूसरे) सहित ब्रिगेडियर अजय कुमार, ब्रिगेडियर मंगल सिंह, ब्रिगेडियर रविंदर यादव, ब्रिगेडियर सुखवीर सिंह आदि सन्य अफसर उपस्थित रहे। जागरण

आरवीसी सेंटर एंड कालेज के ऐतिहासिक भंडारी हाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दूसरे दिन उपस्थित मुख्य अतिथि एडिशनल क्वार्टर मास्टर जनरल मेजर जनरल विक्रम शर्मा (बाएं से चौथे), रिमाउंट वेटनरी सर्विसेस के आफिशिएटिंग महानिदेशक मेजर जनरल एसएस बालाजी (बाएं से तीसरे), आरवीसी सेंटर एंड कालेज के कमांडेंट मेजर जनरल लक्ष्मीकांत मदरेवर (दाएं से दूसरे) सहित ब्रिगेडियर अजय कुमार, ब्रिगेडियर मंगल सिंह, ब्रिगेडियर रविंदर यादव, ब्रिगेडियर सुखवीर सिंह आदि सन्य अफसर उपस्थित रहे। जागरण

HighLights

  1. घोड़ों में सर्जिकल कालिक उपचार में समय महत्वपूर्ण।

  2. आरवीसी मेरठ में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन।

जागरण संवाददाता, मेरठ। युद्ध के मैदान से लेकर सैन्य परिवहन और अन्य विशेष अभियानों तक घोड़े आज भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं में उपयोग किए जाते हैं। ऐसे सेवा पशुओं की सेहत और कार्यक्षमता बनाए रखना सैन्य पशु चिकित्सा की बड़ी जिम्मेदारी है। खासकर घोड़ों में होने वाला सर्जिकल कालिक (आंतों में गंभीर रुकावट या रक्त प्रवाह बाधित होने की स्थिति) ऐसी आपात चिकित्सा समस्या है, जिसमें उपचार का निर्णय लेने में कुछ घंटों की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है।

दर्द निवारक दवाओं के बावजूद लगातार दर्द, बढ़ती हृदय गति और आंतों में रुकावट के संकेत मिलने पर तत्काल सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। अस्पताल पहुंचने के बाद शुरुआती 60 से 90 मिनट में लिया गया चिकित्सकीय निर्णय घोड़े के जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकता है।

छावनी स्थित आरवीसी सेंटर एंड कालेज में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार ‘एडवांस्ड स्ट्रेटजीज इन इक्वाइन एंड कैनाइन थेराप्यूटिक्स एंड मकडर्न कैनाइन आपरेटिव ट्रेनिंग’ के दूसरे दिन शनिवार को घोड़ों की गंभीर बीमारियों, आधुनिक शल्य चिकित्सा, एनेस्थीसिया प्रबंधन और आपरेशन के बाद पुनर्वास पर विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।

दर्द निवारक दवाओं के बाद भी राहत नहीं तो सर्जरी की तैयारी
अमेरिका से आनलाइन जुड़े डा. शांतिभूषण झा ने बताया कि घोड़ों में कालिक के उपचार की सबसे बड़ी चुनौती यह पहचानना है कि मामला सामान्य पाचन समस्या का है या आंतों में ऐसी रुकावट पैदा हो चुकी है, जिसके लिए सर्जरी जरूरी है। कहा कि लगातार बना रहने वाला दर्द सबसे महत्वपूर्ण संकेत है।

यदि दर्द निवारक दवाएं देने के बावजूद घोड़ा बेचैन रहता है, बार-बार जमीन पर लेटता है, लुढ़कने की कोशिश करता है या कुछ समय बाद दर्द फिर शुरू हो जाता है तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। बताया कि घोड़ों में हृदय गति 60 प्रति मिनट से अधिक होना चिंता का विषय है। 70 से 80 प्रति मिनट तक पहुंचने वाली हृदय गति, अत्यधिक गैस्ट्रिक रिफ्लक्स और अल्ट्रासाउंड में छोटी आंत का असामान्य रूप से फैलना सर्जिकल कालिक की आशंका बढ़ाते हैं।

सर्जिकल कालिक की पहचान में अल्ट्रासाउंड, रेक्टल जांच और नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से मिलने वाले रिफ्लक्स की जांच महत्वपूर्ण है। एक बार में दो लीटर से अधिक गैस्ट्रिक रिफ्लक्स मिलना गंभीर संकेत हो सकता है। डा. झा ने बताया कि आपरेशन से पहले घोड़े को स्थिर करना जरूरी है। इसके लिए नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से पेट में जमा गैस और तरल पदार्थ निकालना, नस में कैथेटर लगाना, आवश्यक फ्लूड देना और रक्त में लैक्टेट, पीसीवी, टोटल प्रोटीन, इलेक्ट्रोलाइट, कैल्शियम और ग्लूकोज की जांच करनी चाहिए।

डा. झा ने सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया प्रबंधन पर कहा कि आइसोफ्लुरेन जैसी एनेस्थीसिया दवाओं के कारण रक्तचाप गिर सकता है। इससे मांसपेशियों और शरीर के दूसरे अंगों तक रक्त की आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा रहता है। इसलिए संतुलित एनेस्थीसिया, लिडोकेन इन्फ्यूजन, फ्लूड थेरेपी और जरूरत के अनुसार डोब्यूटामाइन जैसी दवाओं का उपयोग किया जाता है। आपरेशन के दौरान औसत धमनी रक्तचाप 70 एमएम एचजी से ऊपर बनाए रखने और पर्याप्त आक्सीजन उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

आपरेशन के बाद शुरुआती 60 मिनट सबसे संवेदनशील होते हैं। इस दौरान घोड़े को सुरक्षित तरीके से होश में लाने, गिरने से बचाने और आवश्यकता के अनुसार आक्सीजन देने की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने सर्जिकल कालिक के करीब 80 प्रतिशत मरीज घोड़ों अस्पताल से जीवित छुट्टी पाने, एक वर्ष बाद जीवित रहने की दर लगभग 60 से 68 प्रतिशत और काम पर लौटने की दर करीब 84 प्रतिशत तक बताया।

घोड़े को देखकर पहले 10 सेकंड में भी मिल सकते हैं गंभीर बीमारी के संकेत
इंडियन एसोसिएशन आफ इक्वाइन प्रैक्टिशनर्स के अध्यक्ष डा. फिरोज खंबाटा ने कहा कि सबसे कठिन फैसला यह करना होता है कि घोड़े को दवाओं से उपचार दिया जाए या तत्काल आपरेशन के लिए ले जाया जाए। इस निर्णय में देरी से आंतों के ऊतक नष्ट हो सकते हैं। बताया कि घोड़े की जांच केवल उपकरणों से शुरू नहीं होती। उसके व्यवहार और आंखों के भाव को देखकर भी शुरुआती संकेत मिल सकते हैं।

बेचैनी, जमीन पर पैर पटकना, बार-बार लेटना और आंखों में तनाव गंभीर दर्द की ओर संकेत करते हैं। शुरुआती उपचार में फ्लुनिक्सिन और नस के माध्यम से फ्लूड देने के बाद घोड़े की स्थिति पर लगातार 30 से 40 मिनट तक निगरानी रखनी चाहिए। कहा कि दर्द बने रहने पर रेक्टल जांच करके बड़ी आंत में फैलाव और छोटी आंत की असामान्य स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इसके साथ अल्ट्रासाउंड, नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से रिफ्लक्स और पेट के तरल पदार्थ की जांच की जाती है।

लगातार बढ़ती हृदय गति और दर्द का नियंत्रित नहीं होना सर्जरी की आशंका को मजबूत करता है। उन्होंने चेताया कि बड़ी आंत के मुड़ने या छोटी आंत में रक्त प्रवाह रुकने की स्थिति में इंतजार करना घातक हो सकता है।

न्यूटन के नियमों से समझाई घोड़ों के खुरों की बनावट और चाल
वंतारा के डा. बी. रामनाथन ने ‘करंट एडवांसमेंट इन इक्वाइन पोडियाट्री : बायोमैकेनिक्स, लैमिनाइटिस’ विषय पर घोड़ों के खुरों की बनावट और उनकी चाल को न्यूटन के गति संबंधी तीन नियमों से समझाया। बताया कि खुर के अगले हिस्से की लंबाई घोड़े के पैर को जमीन से उठाने की प्रक्रिया यानी ब्रेकओवर को प्रभावित करती है।

घोड़े की गति और जमीन पर पैर रखने के दौरान लगने वाला बल खुर के अलग-अलग हिस्सों पर दबाव पैदा करता है। पैर की बनावट में असंतुलन होने पर जमीन से मिलने वाली प्रतिक्रिया शक्ति भी बदल जाती है। बताया कि आधुनिक इक्वाइन पोडियाट्री में पारंपरिक नालबंदी के साथ डिजिटल एक्स-रे, सीटी, एमआरआइ और थ्री-डी प्रिंटेड माडल का उपयोग किया जा रहा है। घोड़ों में लैमिनाइटिस की स्थिति में खुर के भीतर हड्डी को सहारा देने वाली लैमिनर संरचना कमजोर हो जाती है। इससे मुख्य हड्डी घूम सकती है या नीचे खिसक सकती है।

उपचार में खुर के अगले हिस्से का दबाव कम कर एड़ी और पिछले हिस्से को सहारा देना महत्वपूर्ण है। इसके लिए विशेष क्लाग, रेल शू, ओपन-टो डिजाइन, सिलिकान सपोर्ट और कंपोजिट नालों का उपयोग किया जाता है। डा. रामनाथन ने फुट एब्सेस, थ्रश और कैंकर जैसी बीमारियों के बारे में भी बताया। कहा कि खुर में फोड़ा होने पर घोड़ा अत्यधिक दर्द के कारण पैर जमीन पर नहीं रख पाता।

कई बार इसे लैमिनाइटिस या गंभीर हड्डी संबंधी समस्या समझ लिया जाता है। ऐसे मामलों में सही पहचान और समय पर फोड़े की निकासी जरूरी है। बताया कि लंबे समय तक एक पैर पर वजन न डाल पाने से दूसरे पैर में भी लैमिनाइटिस का खतरा बढ़ जाता है। बीमारी आने के बाद उपचार करने के बजाय घोड़े की नस्ल, कार्य और पैर की बनावट के अनुसार पहले से वैज्ञानिक नालबंदी करना अधिक प्रभावी है।

आंखों की सूजन और संक्रमण से जा सकती है घोड़े की रोशनी
जीएडीवीएएसयू की वैज्ञानिक डा. निकिता गुप्ता ने ‘करंट पर्सपेक्टिव्स आन डायग्नोसिस, ट्रीटमेंट एंड प्रिवेंशन आफ कामन आप्थैल्मिक कंडीशंस इन होर्सेज’ विषय पर व्याख्यान में बताया कि घोड़ों की आंखों की बनावट और दृष्टि का क्षेत्र अन्य पशुओं से अलग होता है। उनकी दृष्टि लगभग 360 डिग्री तक फैली होती है।

आंखों की जांच के लिए टोनोमेट्री, नर्व ब्लाक, अल्ट्रासाउंड और फ्लोरेसिन डाई टेस्ट जैसी तकनीकें महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने घोड़ों में कार्नियल अल्सर, मोतियाबिंद, आंखों के परजीवी संक्रमण और ट्यूमर के बारे में जानकारी दी। इक्वाइन रिकरेंट यूवाइटिस को दृष्टि खोने का प्रमुख कारण बताते हुए कहा कि इसमें आंखों में बार-बार सूजन होती है।

लेप्टोस्पाइरा संक्रमण इसकी महत्वपूर्ण वजहों में शामिल है। आंखों से पानी आना, पुतली सिकुड़ना, दर्द और रोशनी के प्रति संवेदनशीलता इसके शुरुआती लक्षण हैं। समय पर उपचार नहीं होने पर मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और रेटिना को नुकसान हो सकता है। बताया कि घोड़ों में ग्लूकोमा सामान्यतः किसी अन्य बीमारी, विशेषकर यूवाइटिस के कारण विकसित होता है। इसके उपचार में आंख के भीतर तरल पदार्थ के निर्माण को नियंत्रित करने वाली दवाओं का उपयोग किया जाता है। कार्नियल अल्सर के गंभीर मामलों में विशेष सर्जिकल तकनीकों और एंटीमाइक्रोबियल उपचार की आवश्यकता होती है।

इंटास फार्मास्यूटिकल्स के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर डा. विपुल ने पशुओं के पाचन स्वास्थ्य के लिए विकसित पोस्टबायोटिक उत्पाद जूलैक प्रोपेस्ट की जानकारी दी। बताया कि सामान्य प्रोबायोटिक्स में जीवित लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं, जबकि पोस्टबायोटिक्स में प्रोबायोटिक गतिविधि से उत्पन्न मेटाबोलाइट्स और जैव सक्रिय घटक शामिल होते हैं।

दूसरे सत्र में अमेरिका के डा. सजीश थामस, और भारत के पेडिग्री से डा. केजी उमेश, लुवास से डा. रजत गर्ग और तनुवास के डा. के जयराजा ने कैनाइन थिरेप्यूटिक्स पर व्याख्यान दिए। रिमाउंट वेटनरी सर्विसेस के आफिसिएटिंग महानिदेशक मेजर जनरल एसएस बालाजी उपस्थित रहे। आरवीसी के क्वार्टर मास्टर जनरल ने समापन भाषण दिया और आरवीसी के कमांडेंट मेजर जनरल लक्ष्मीकांत मदरेवर ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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