मेरठ, [संतोष शुक्ल]। काशी और मैहर की संगीत विरासत में रमे पंडित रोनू मजूमदार जब साधनारत होते हैं तो बांसुरी से छनती हवा संगीत की प्राणवायु बन जाती है। महज तीन गज लंबा लकड़ी का साज जादुई बन जाता है। एक बंद हॉल में भी वृंदावन की फिजा घुलने लगती है। जब रागशास्त्र के पन्ने पलटते हैं तो संगीत के पनघट पर सुरों का मेला सज पड़ता है। गुरुवार की एक सिंदूरी शाम संगीत के सफर पर थी। शहर के संगीत प्रेमियों ने रोनू के बांसुरी वादन और बागेश्री दास के खयाल गायन के संगम में डुबकी लगाई।
मेरे कंठ बसो महारानी
वक्त था किराना घराना के संगीत साधक पंडित जगदीश मोहन एवं सरगम मंदिर के पूर्व अध्यक्ष पुरुषोत्तम लाल पंडित को सुरमयी श्रद्धांजलि देने का। सिटी वोकेशनल स्कूल में शाम पांच बजे से सजी संगीत संध्या का आगाज ही सधा हुआ रहा। पहली प्रस्तुति राग चारूकेशी में निबद्ध ‘मेरे कंठ बसो महारानी’ के साथ हुई। डा. रागिनी प्रताप के उम्दा स्वर संयोजन पर स्कूल की छात्रओं ने बेहतरीन सामंजस्य दिखाते हुए सरस्वती वंदना की। तबले पर राकेश परिहार एवं हारमोनियम पर मैराज खान ने असरदार संगीत की।

गोधूलि में गाढ़ा हुआ कल्याण का रंग
प्रसिद्ध बांसुरी वादक रोनू मजूमदार ने मंच संभाला तो रसिक श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। रोनू मेरठ की नब्ज समझते हैं, ऐसे में उन्होंने राग गोरख कल्याण पेश करने से पहले राग की तासीर और पकड़ का भी संक्षिप्त परिचय दिया। उन्होंने पहले लंबी तान के जरिए सुरों को साधा, फिर ‘राग गोरख कल्याण’ के सफर पर चल पड़े। असल में यह राग दुर्गा एवं बागेश्री का मिश्रण है, जिसमें कल्याण की पूरी छटा होती है। गोधूलि के बाद गहराते अंधेरे के साथ ही इस राग की प्रकृति जवान होने लगती है।
प्रेयसी की सज गई बंदिश
रोनू ने राग गोरख कल्याण में अलाप, जोड़, झाला की बेहतरीन प्रस्तुति की। उनके साथ बनारस घराने के होनहार तबलावादक प्रांशु चतुरलाल ने संगीत की सभी चौखटों को बड़ी सलीके से पार किया। विलंबित एवं द्रुत बंदिशों के बीच उनकी अंगुलियों ने तबला वादन की संभावनाओं को उजागर किया। करीब आधे घंटे की प्रस्तुति में रोनू ने कई बार बांसुरी वादन में चमत्कारिक प्रयोग कर हैरान किया है। उन्होंने हार्ट टू हार्ट एल्बम की एक बंदिश बजाई, जिसमें उनके साथ उस्ताद जाकिर हुसैन ने तबलावादन किया था। ‘खेलन चली सुंदरी’ नामक बंदिश साज का साथ पाते ही प्रेयसी की तरह निखर गई। हॉल में इतना सन्नाटा था कि सिर्फ वाद्य आपस में बात करते नजर आए।
राग पहाड़ी संग मीरा भजन
महान सितारवादक पंडित रविशंकर के शिष्य पंडित रोनू मजूमदार ने अंत में राग पहाड़ी की सरगम छेड़ते हुए तमाम यादगार धुनों की याद ताजा कर दी। इसी बीच सुरों के सरगम में तैरते हुए उनकी बांसुरी अचानक ‘पायों जी मैंने राम रतन धन पायो’ गाने लगी। सुर इतने साफ कि अनाड़ी भी मीरा भजन गाने लगे। श्रोताओं ने आवाज में आवाज मिला दी।
बागेश्री दास की सधी गायकी
कार्यक्रम के अंत में कोलकाता की गायिका बागेश्री दास ने सुरों का बेहतरीन संस्कार दिखाया। उनके गले का ठहराव उनकी रियाज पर मुहर है। खयाल, ठुमरी एवं गजल गायकी में उनकी आवाज गजब का असर छोड़ती है। रोनू ने भी बागेश्री की गायकी को बड़ी तल्लीनता से सुना, और सराहा। तबले पर देबाशीष अधिकारी, हारमोनियम पर मैराज खां एवं कीबोर्ड पर सतीश ने सधा हुआ फन दिखाया। संचालन डा. सुनंदा मुकेश एवं सृंजोय बनर्जी ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षा डा. रागिनी प्रताप, अनूप सिंघल, राकेश जौहरी ने कार्यक्रम का संयोजन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ डा. अदीप मित्र, प्रेम मेहता ने किया था।
अवार्ड वापसी गैंग ने किया कला का अपमान
रोनू मजूमदार ने कहा कि दो वर्ष पहले अवार्ड वापसी गैंग ने कला एवं साहित्य का अपमान किया। दावा किया कि वापस करने वाले शायद इसके हकदार ही नहीं थे। अवार्ड वापसी गैंग के खिलाफ रोनू अभिनेता अनुपम खेर के साथ उतरे भी थे। उन्होंने आरडी बर्मन और किशोर कुमार को आदर्श जोड़ी बताया। कहा कि माचिस फिल्म तक उन्होंने मूवी में बांसुरी वादन किया। अब इसकी गुंजाइश कम हो गई है। महान गायक मोहम्मद रफी को संगीत का फकीर मानते हैं।

Posted By: Ashu Singh