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बेटी के दौड़ने पर जो पिता को मारते थे ताने, आज वही लोग एशियन गेम्स में मेडल जीतने पर DSP पारुल चौधरी पर जता रहे नाज

Published: Mon, 28 Sep 2026 08:48 AM (IST)

एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर डीएसपी पारुल चौधरी ने अपने किसान पिता के सपनों को साकार किया, जिन्होंने बेटी के दौड़ने पर समाज के ताने सहे थे।

एशियन गेम्स में पारूल चौधरी और इकलौता गांव में राष्ट्रीय खिलाड़ी पारुल चौधरी का परिवार एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी मनाते हुए

एशियन गेम्स में पारूल चौधरी और इकलौता गांव में राष्ट्रीय खिलाड़ी पारुल चौधरी का परिवार एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी मनाते हुए

HighLights

  1. पारुल चौधरी ने एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा।

  2. किसान पिता ने बेटी के दौड़ने पर समाज के ताने सहे।

  3. गांव के कच्चे रास्तों पर नंगे पैर अभ्यास कर बनीं डीएसपी।

जागरण संवाददाता, मेरठ। गांव की पगडंडियों पर दौड़ती पारुल के कदमों के साथ उसके किसान पिता कृष्णपाल के सपने भी दौड़ते थे। तब गांव के कुछ लोग ताना मारते थे और कहते थे कि बेटी से दौड़ लगवाते हो, शर्म नहीं आती।

तब पिता ताने सुनकर भी चुप रहते थे और बेटी दौड़ती रही। खेतों की मिट्टी से निकली पारुल ने आखिरकार उसी ताने का जवाब एशियन गेम्स के कांस्य पदक से दिया। आज जिन लोगों की नजर में बेटी का दौड़ना शर्म की बात था, वही लोग अब पारुल की उपलब्धि पर नाज कर रहे हैं।

इकलौता गांव निवासी कृष्णपाल पेशे से किसान है। वह बताते हैं कि उनके दो बेटी और दो बेटे हैं। सबसे बड़ा बेटा राहुल चौधरी एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है। दूसरे नंबर की बेटी प्रीति भी तीन और पांच किलोमीटर दौड़ती थी। वर्तमान में वह यूपी पुलिस में सब इंस्पेक्टर है।

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तीसरे नंबर की पारूल चौधरी है, जो देश का नाम रोशन कर रही है और मुरादाबाद में डीएसपी है। चौथे नंबर का बेटा रोहित चौधरी है, जो यूपी पुलिस में कांस्टेबल है। पिता ने बताया कि प्रीति और पारूल दोनों बहनों को बचपन से दौड़ने का शौंक था। जब वह सुबह चार बजे उठकर गांव में दौड़ती थी तो कुछ लोग कृष्णपाल से बोलते थे कि बेटियों को क्या फौज में भर्ती कराएगा, जो उन्हें दौड़ा रहा है। वह चुप रहते थे।

पहले प्रीति कामयाब हुई तो उन्हीं गांव वालों ने ढोल बजाकर जश्न मनाया। अब पारूल डीएसपी बन गई और देश के लिए पदक जीतकर ला रही है तो वहीं लोग नाज कर रहे हैं। राहुल ने बताया कि रविवार की शाम सात बजे पारूल ने फोन करके उन्हें पदक के बारे में बताया। जिसके बाद परिवार में मिठाई बांटकर खुशी का जाहिर की गई।

2008 में शुरू की थी प्रैक्टिस, 2012 में बनी थी डिस्ट्रिक चैंपियन

पिता कृष्णपाल और भाई राहुल चौधरी बताते हैं कि पारूल ने 2008 में ब्लाक स्तर से दौड़ना शुरू किया था। 2012 में वह जिला स्तर पर प्रथम आई थी। इसके बाद उसने मुड़कर नहीं देखा और दौड़ती ही रही। पारूल ने हमेशा गांव के कच्चे रास्तों पर ही प्रैक्टिस की है।

नगे पैर दौड़ने से राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक का सफर

15 अप्रैल 1995 को मेरठ के इकलाुता गांव में किसान परिवार में जन्मीं पारुल चौधरी ने बेहद सामान्य परिस्थितियों से अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स तक का सफर तय किया है।

पिता कृष्णपाल चौधरी और मां राजेश देवी ने उनकी खेल यात्रा में साथ दिया। स्कूल स्तर पर पारुल ने शुरुआत में नंगे पैर दौड़ लगाई। पहले 800 मीटर में कदम रखा और धीरे-धीरे 1500, 3000 व 5000 मीटर और 3000 मीटर स्टीपलचेज को अपनी प्रमुख स्पर्धा बनाया।

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