मेरठ, जेएनएन। महामारी में चारों तरफ निराशा और भय के बीच हौसला बढ़ाने वाले भी प्रसंग हैं। युवावस्था में जहां लोग कोरोना के शिकार बन रहे हैं, वहीं 81 साल की सुमन जैन ने कोरोना के साथ ही साइटोकाइन स्टार्म को भी शिकस्त दे दी। 27 अप्रैल को संक्रमित हुईं सुमन की तबीयत छह मई को अचानक बिगड़ गई थी। शुगर की बीमारी से जूझ रहीं सुमन के बेटे व छाती रोग विशेषज्ञ डा.आयुष जैन एवं फिजिशयन डा.संदीप जैन ने घर पर ही इलाज करना शुरू किया।

तबीयत में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन छह मई को साइटोकाइन स्टार्म का अटैक आया और आक्सीजन का स्तर गिरकर 56 तक पहुंच गया। सुमन ने हौसला नहीं खोया। उन्हें न्यूटिमा अस्पताल में भर्ती कराया गया। डा. संदीप जैन ने बताया कि डा. विश्वजीत बेंबी एवं डा. संदीप गर्ग के प्रयास एवं कुशल नìसग स्टाफ के सहयोग से ठीक हो गईं। 14 मई को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। डा. बेंबी ने बताया कि मरीज का आत्मबल बीमारी को शिकस्त देने में अहम साबित होता है। डाक्टरों ने बताया कि कोरोना मरीजों के इलाज में टाइमिंग का बेहद महत्व है।

डेढ़ माह के नवजात ने जीती कोरोना से जंग

एक नवजात ने कोरोना को शिकस्त देकर मानों दूसरा जन्म पा लिया हो। हापुड़ में एक अप्रैल को पैदा हुए शिशु को गंभीर कोरोना हो गया था। सांस में दिक्कत समेत कई अन्य जटिलताओं की वजह से शिशु को वेंटीलेटर पर लेना पड़ा, लेकिन जिंदगी जीत गई। बाल रोग विशेषज्ञ डा. अमित उपाध्याय ने बताया कि शिशु को हापुड़ में संक्रमण लगा। उसका नोएडा में इलाज चला। फिर 27 अप्रैल को माता-पिता लेकर न्यूटिमा पहुंचे, जहां उसे भर्ती किया गया। डाक्टर ने बताया कि शिशु प्रीमेच्योर पैदा हुआ था, ऐसे में प्रतिरोधक क्षमता और कम हो जाती है। बच्चा जब भर्ती हुआ तो उसकी उम्र 26 दिन थी।

शिशु एंटीजन और आरटीपीसीआर दोनों जांच में पाजिटिव मिला था। उसे सप्ताहभर से ज्यादा समय तक बाइपैप और वेंटीलेटर पर रखा गया। डाक्टर ने बताया कि शिशु को स्टेरायड एवं हाई एंटीबायोटिक भी देनी पड़ी। करीब 18 दिन तक भर्ती रहने के बाद शिशु की तबीयत सुधर गई, और ठीक होकर अपने माता-पिता की गोद में वापस आ गया। डाक्टर अमित ने बताया कि वेंटीलेटर पर जाने के बाद कोरोना मरीज के बचने की संभावना न्यूनतम रह जाती है, लेकिन शिशु ने वायरस को हरा दिया।