डॉक्टर और मरीज का रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि चिकित्सा की मूल भावना सर्वोपरि रहे। इलाज के साथ मरीज को संतुष्टि भी मिलनी चाहिए। मेरठ के डॉक्टर राहुल मित्थल ऐसे ही फिजिशियन हैं, जो डॉक्टरों के लिए भी मानक तय करते हैं।

राहुल मित्थल मानते हैं कि कई डॉक्टरों में ईमानदारी के साथ अहंकार भी है और चिकित्सा की मूल भावना यहीं पिछड़ जाती है। सरल स्वभाव के डॉक्टर मित्थल दवा देने से पहले मरीज की काउंसलिंग कर लेते हैं। वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शीर्ष फिजिशियनों में शुमार हैं, जिसकी डायग्नोसिस स्किल से नए डॉक्टर सीख रहे हैं। शुगर, पेट, हृदय और वायरल संक्रमण के इलाज में उन्हें विशेष महारत है। स्वाइन फ्लू एवं डेंगू संक्रमण के दौरान भी उनका धैर्य मरीजों को ढांढ़स बंधाता है।

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डॉक्टर राहुल मित्थल ने 1977 में लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज में एमबीबीएस में दाखिला लिया। 1983 में एमडी में प्रवेश लिया, और लगन के साथ शिक्षा पूरी की। स्वभाव से शालीन और मेधावी छात्र रहे डॉक्टर राहुल ने शुगर के इलाज में विशेषज्ञता हासिल की। उनके पास देश-विदेश के तमाम संस्थानों से ऑफर थे, किंतु निजी प्रैक्टिस को तरजीह दी।

हॉर्ट, हाइपरटेंशन, पेट और संक्रमण संबंधी बीमारियों की गहरी समझ उन्हें नए डॉक्टरों के लिए आइकॉन बनाती है। चिकित्सा सेमिनारों में उन्हें बड़ी तल्लीनता के साथ सुना जाता है। उनकी मंशा है कि आम और गरीब आदमी महंगी जांच एवं दवाइयों के मकड़जाल से उबरे। वह सरकार को महंगी दवाओं के मूल्य नियंत्रण की भी सलाह देते हैं।

राहुल मित्थल की सलाह है कि चिकित्सा बीमा जन-जन तक पहुंचे, जिससे गरीब मरीज भी स्तरीय इलाज हासिल कर सकें। हर व्यक्ति को स्तरीय इलाज पाने का मौलिक हक है। किंतु इसके लिए सरकार द्वारा बीमा का दुरुपयोग रोकना आवश्यक है। साथ ही मॉनिटरिंग एजेंसी बनाना जरूरी है।

वे कहते हैं कि दवाइयों का मूल्य नियंत्रित होना चाहिए। हालांकि केंद्र सरकार ने सात सौ दवाइयों को इस श्रेणी में रखा है, किंतु अब भी कई महंगी दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। उपकरणों पर भी मूल्य नियंत्रण प्रणाली लागू होनी चाहिए। जेनरिक कांसेप्ट भी ठीक है, किंतु दवाओं की गुणवत्ता प्रभावित न हो।

प्रदेश में मेरठ को चिकित्सा हब कहा जाता है। जानकारी और गुणवत्ता के मामले में मेरठ के चिकित्सक किसी भी शहर से कमतर नहीं हैं। शिक्षा हासिल करने एवं सीखने का बेहतर माहौल है। नियमित रूप से चिकित्सीय सेमिनार होते रहते हैं, किंतु वातावरण भयमुक्त बनाने की जरूरत है।

डॉक्टर मित्थल कहते हैं कि अब एक डॉक्टर से संस्थान संचालित करने का वक्त निकल गया है। अस्पतालों को अलग-अलग विभाग के जरिए संचालित किया जाए। सभी विभागों के अपने विशेषज्ञ पैनल होने चाहिए, जिससे 24 घंटे उनकी उपलब्धता बनी रहे। सुपरस्पेशियलिटी के दौर में यह प्रयोग बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि नई पीढ़ी के तमाम डॉक्टरों में जानकारी बेहतर है। वह ईमानदार भी हैं, किंतु अहंकार से दिशा भटक जाती है। अहंकार होने से ईमानदारी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। डॉक्टरों को समझना होगा कि अंतत: मरीज का हित सर्वोपरि होता है। हमें सेवाभाव कतई नहीं छोड़ना चाहिए। 

- डॉ. राहुल मित्थल
( डॉ. मित्थल को पश्चिमी यूपी के शीर्ष फिजिशियनों में शुमार किया जाता है।)

By Nandlal Sharma