गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊपर माना गया है। और एक ऐसा गुरु जो दृष्टिबाधित बच्चों के जीवन को ज्ञान की ज्योति से रोशन करे तो कहने ही क्या। ऐसे ही एक गुरु हैं जागृति विहार के प्रवीण शर्मा (47 वर्ष)। जिन बच्चों को अभिभावक बोझ समझने लगे थे, उनको वात्सल्य की छाया देने के लिए प्रवीण ने नौकरी छोड़ दी। किराये के भवन में ब्रजमोहन स्कूल फार द ब्लाइंड की नींव डालकर पिछले पांच साल से दृष्टिबाधित बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बच्चों के खाने-पीने, पढ़ने की व्यवस्था निशुल्क है। लोगों की मदद से वह इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं।

आत्मविश्वास से लबरेज हैं यहां के बच्चे
पांच से 15 साल के दृष्टिबाधित बच्चे इस पाठशाला में पढ़ते हैं। दान से चलने वाले स्कूल में मेरठ के अलावा मुजफ्फरनगर, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और बिहार से आए हुए बच्चे हैं। छोटे बच्चों के खाने-पीने से लेकर उन्हें स्नान कराने, रात में बिस्तर पर सुलाने का काम प्रवीण और उनकी पत्नी खुद करती हैं। यहां सामान्य शिक्षा के साथ कंप्यूटर, कला, साहित्य, संस्कृति इन बच्चों को सिखाई जाती है।

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कमाल कर गईं बेटियां
ब्लाइंड स्कूल में बच्चों को शिक्षा के साथ अनुशासन का पाठ भी पढ़ाया जाता है। प्रवीण का मानना है कि ऐसे बच्चों को शिक्षित करने से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता। ब्लाइंड स्कूल उन्हें हर तरह से काबिल बनाने की कोशिश करता है। उनकी यह कोशिश सफल भी हो रही है। नौ साल की रितिका सिंह ने स्कूल का नाम रोशन किया है। श्रीमद्भागवत गीता को कंठस्थ करने वाली रितिका को इसी साल मुख्यमंत्री ने रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड दिया। रीदा जेहरा ने भी पिछले साल रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड तत्कालीन मुख्यमंत्री से प्राप्त किया था। 

 

कई बार अभिभावक तैयार नहीं होते
स्कूल में बच्चों को पढ़ाना प्रवीण शर्मा के लिए आसान नहीं रहा है। इन बच्चों को कोई फीस नहीं ली जाती। प्रवीण की सेवा और संकल्प को देखकर बहुत से लोग आटा, चावल, ड्रेस देने के लिए तैयार रहते हैं। जब से स्कूल की नींव पड़ी बच्चों के खाने-पीने की तो कोई कमी नहीं हुई, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ऐसे दृष्टिबाधित बच्चों को तलाशना है। सीएमओ आफिस से डाटा नहीं मिल पाता है। कई अभिभावक अपने बच्चे को किसी भी स्कूल में भेजना नहीं चाहते हैं। गांव में जाकर ऐसे अभिभावकों को मनाना पड़ता है। दान की भी एक सीमा रहती है। कई बार इससे बच्चों की सभी जरूरतें पूरी नहीं पाती। कई सरकारी स्कूल छोटे बच्चे को नहीं लेते हैं। ऐसे बच्चों की अभिभावक की तरह देखभाल करने की चुनौती रहती है।

जगह छोटी पड़ गई
प्रवीण शर्मा कहते हैं कि लोगों के सहयोग से बच्चों के खाने की कभी कमी नहीं हुई। आटा खत्म होने से पहले ही लोग मदद कर जाते हैं। स्कूल अभी किराए के भवन में चल रहा है। बच्चों के खेलने के लिए जगह नहीं है। अगर साधन पर्याप्त हों तो इन बच्चों को और बेहतर सुविधा दी जा सकती है। लोगों के सहयोग से लोहियानगर में स्कूल के लिए जगह ली गई है। प्रवीण कहते हैं कि अगर संसाधन उपलब्ध हो जाएं तो ऐसे बच्चों के लिए एक बड़ा स्कूल खोलना चाहेंगे।

दृष्टिबाधित बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा देना ही मेरा मकसद है। मैं इन बच्चों को माता-पिता पर बोझ नहीं बनने देना चाहता हूं। इसके लिए पूरी मेहनत करता हूं कि ये शिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। आज इस तरह के बच्चे सिविल सेवा की परीक्षा में भी सफल हो रहे हैं। अभिभावकों से भी अपील करता हूं कि वह खुद को या अपने बच्चों को कोसने की जगह उन्हें पढ़ाएं। वे किसी से भी कमतर नहीं हैं।
प्रवीण शर्मा, संचालक, ब्रजमोहन स्कूल फार द ब्लाइंड

मैं प्रवीण की मेहनत को सलाम करता हूं। मेरी बेटी रीता जेहदा दृष्टिबाधित है। कई बार लगा कि बगैर आंख की बच्ची क्या कर पाएगी। लेकिन उनके संरक्षण में आने के बाद उसकी दुनिया ही बदल गई। वह गीता के श्लोक को कंठस्थ कर चुकी है। उसे रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड भी मिल चुका है।
रईस हैदर, रीता जेहदा के पिता

 

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By Gaurav Tiwari