[रवि प्रकाश तिवारी] मेरठ। हस्तिनापुर के धार्मिक पक्ष को तो हम जानते ही हैं, लेकिन कई ऐसे पहलू और भी हैं जो हस्तिनापुर की महत्ता को और बढ़ाते हैं। शुरू से ही शासन व्यवस्था का केंद्र रहा हस्तिनापुर मुगलों के साथ ही मराठाओं और अंग्रेजों के लिए भी अहम स्थान रखता है। हस्तिनापुर में धर्म की खूब गंगा बही। हिंदु, जैन, बौद्ध, सिख सभी धर्मो के आदिकाल के प्रमाण भी मिलते हैं। हस्तिनापुर की ही धरती है जहां मराठा शासन कुछ वर्षो तक रहा और आज उसके प्रमाण यहां के प्राचीन मंदिरों के रूप में मिलते हैं। नजीब खान से दो बार की लड़ाई के बाद हस्तिनापुर पर मराठा का बिज हुए और इस तरह पूरे दोआब क्षेत्र पर उनका कब्जा रहा। यहीं पर पेशवा ने रणनीति तैयार की और फिर मराठा दिल्ली की ओर बढ़े थे।

कभी मराठा शासन का केंद्र था हस्तिनापुर

आइए, आज हस्तिनापुर के उस स्थान की ओर हम आपको लिए चलते हैं जो मराठा शासन का केंद्र हुआ करता था और उसके निशां आज भी होने का दावा किया जाता है। कुछ प्रमाण खंडहरों और शिल्पशैली के रूप में आज भी मिलते हैं।

पांडव टीले पर ही लगभग 40 फीट की ऊंचाई पर पहुंचेंगे तो एक मकान का हिस्सा दिखेगा। जंगल के बीच एक लॉननुमा साफ-सुथरी खुली जगह। क्यारियों में लगे फूल। एक ओर चार-पांच कमरों का मकान और उसी के पास यज्ञवेदी। इसी जगह को रघुनाथ टीला कहते हैं। रघुनाथ टीला नाम वीर मराठा रघुनाथ राव से जुड़कर पड़ा था। जब टीला ही उनके नाम पर है तो आइए, थोड़ा उनके बारे में भी जान लें।

इतिहास में दर्ज है रघुनाथ राव की भूमिका

जेएल मेहता की पुस्तक एडवांस स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मॉर्डन इंडिया (1707-1813) के पन्नों को पलटें तो पृष्ठ संख्या 228 पर आपको गंगा-दोआब में रघुनाथ राव की भूमिका के बारे में विस्तार से पता चलेगा। इतिहासकारों के अनुसार मराठाओं ने जब मुगलों के खिलाफ तलवार उठाई और हिंदु राज्य स्थापित करने की दिशा में बढ़ने लगे, उसी क्रम में मराठा पेशवा रघुनाथ राव ने मई, 1757 में आगरा की ओर रुख किया। अब्दाली तब लौट गया था। रघुनाथ राव ने गंगा दोआब में में अपने 20 हजार की मराठा फौज को तैनात कर दिया। यहां से जमुना पार कर मराठाओं ने इटावा और सिकंदरा को कब्जे में लिया और फिर गंगा के दक्षिणी छोर पर बसे कासगंज को भी 17 जून, 1757 में अपने साम्राज्य में मिला लिया। यहां तक राव की सेना को किसी बड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अनूपशहर होते हुए मेरठ का रुख किया और तब हस्तिनापुर पर शासन कर रहे नजीब खान से दो भिडंत के बाद मेरठ भी कब्जा लिया। इतिहासकारों ने लिखा है कि वे यहां कुछ दिनों तक रूके भी। जहां वे रहे, उसे ही रघुनाथ महल कहा गया।

रघुनाथ टीले से उतरते ही एक कुंआ है। आज भी इसमें पानी है। अंदर झांककर देखेंगे तो इस कुंए में ईंटों की परतें यूं नजर आएंगी जैसे इतिहास के पन्ने हों। जनश्रुतियां हैं कि यह कुंआ भी उसी समय का खोदा हुआ है। रघुनाथ टीले पर बने भवन के पीछे ही मंदिर के अवशेष आज भी मिलते हैं।

मराठा शैली अपने आप में प्रमाण है

इतिहासविद् डा. अमित पाठक कहते हैं कि हस्तिनापुर के इतिहास के पन्नों में मराठाओं का जिक्र भी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है। आज हस्तिनापुर में जितने भी पुराने मंदिर मिलते हैं, वे मराठा शैली के ही हैं। पांडुकेश्वर मंदिर का जो भवन है, उसे भी देखने से यही प्रतीत होता है कि मुगलों के जाने के बाद इस मंदिर को पुनस्र्थापित करने का काम मराठाओं ने ही किया। इससे इतर मेरठ तक मराठा शैली के मंदिर-भवन यहां मराठा शासन के होने के प्रमाण हैं। मेरठ शहर के औघड़नाथ मंदिर का मूल स्वरूप हो या आज भी सूरजकुंड पर मिलने वाले कुछ मंदिरों का शिल्प..सभी मराठी शैली के ही हैं। 

Posted By: Prem Bhatt

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