मुस्कान-साहिल को फांसी देने वाले जज ने कहा- समाज में विश्वास और व्यवस्था बहाल करना कोर्ट का दायित्व
मेरठ की अदालत ने बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड सुनाया है। न्यायालय ने ...और पढ़ें

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HighLights
सौरभ राजपूत हत्याकांड में साहिल शुक्ला, मुस्कान रस्तोगी को मृत्युदंड।
अदालत ने कानून-व्यवस्था, सामाजिक विश्वास बनाए रखने पर जोर दिया।
साक्ष्य मिटाने के लिए सात साल का कठोर कारावास भी।
जागरण संवाददाता, मेरठ। बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में दोषी साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तौगी को मृत्युदंड सुनाते हुए अदालत ने समाज में कानून-व्यवस्था, विश्वास और सामाजिक चेतना बनाए रखने के दायित्व को ध्यान में रखा है।
जिला जज की अदालत ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराध समाज में भय का वातावरण बनाता है और सामाजिक चेतना पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे में आपराधिक न्याय व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करने के साथ समाज में स्थिरता, व्यवस्था, विश्वास और एकजुटता कायम करना है।
अदालत ने एडक्कंडी दिनेशन उर्फ पी. दिनेशन बनाम केरल राज्य, 2025 आईएनएससी 28 मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि न्यायालयों का दायित्व आरोपित के अधिकारों और राज्य व समाज के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
महाभारत के श्लोक से समझाया कानून का महत्व
फैसले में महाभारत के श्लोक का भी उल्लेख किया गया, ‘निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥’ इसका भावार्थ है कि वन के बिना बाघ का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है और बाघ से रहित वन भी सुरक्षित नहीं रह पाता। इसलिए बाघ को वन की रक्षा करनी चाहिए और वन को भी बाघ के संरक्षण का दायित्व निभाना चाहिए।

न्याय और कानून के संदर्भ में इसका आशय है कि समाज और कानून एक-दूसरे के पूरक हैं। कानून समाज की रक्षा करता है, जबकि समाज में कानून के प्रति विश्वास और सम्मान व्यवस्था को मजबूत बनाता है।
हत्या में मृत्युदंड, साक्ष्य मिटाने में सात साल की सजा
अदालत ने साहिल शुक्ला पुत्र नीरज शुक्ला निवासी ब्रह्मपुरी और मुस्कान रस्तौगी पत्नी सौरभ राजपूत निवासी ब्रह्मपुरी को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 103(1) के साथ धारा 3(5) के तहत हत्या का दोषी मानते हुए मृत्युदंड सुनाया। दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
जुर्माना अदा नहीं करने पर प्रत्येक दोषी को पांच माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। मृत्युदंड का निष्पादन माननीय उच्च न्यायालय की पुष्टि के अधीन रहेगा। वहीं, धारा 238(ए) के तहत साक्ष्य मिटाने के अपराध में दोनों को सात-सात वर्ष के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
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जुर्माना अदा नहीं करने पर एक-एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। अदालत के आदेश में मृत्युदंड के निष्पादन की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। फैसले में स्पष्ट किया गया है कि मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय की पुष्टि के अधीन है।
