मेरठ, [जागरण स्‍पेशल]। नई शिक्षा नीति 2019 का प्रारूप तैयार है। इसमें भाषा को लेकर कई सिफारिशें की गई हैं। प्रारूप तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने माना है कि स्कूली शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। फिर भी अंग्रेजी का मोह बरकरार है। नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर कुछ प्रदेशों में विरोध है। सरकार को सफाई देनी पड़ी। त्रिभाषा फार्मूले पर हंगामे का क्या औचित्य है, इस विषय पर दैनिक जागरण की अकादमिक संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष और मेरठ कॉलेज में संस्कृत के एसोसिएट प्रोफेसर वाचस्पति मिश्र ने अपने विचार रखे।
आठवीं अनुसूची में हैं 22 भारतीय भाषाएं
संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं का उल्लेख है, जिसमें संस्कृत भी है। देश में हिंदी एक बड़े हिस्से में संवाद की भाषा है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के कुछ हिस्सों में इसका विरोध है, लेकिन इन राज्यों में भी हिंदी की स्वीकार्यता है। आगे भी रहेगी।
भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे से नहीं है खतरा
देश में जितनी भी भाषाएं हैं, उनको आपस में किसी से कोई खतरा नहीं है। सभी को अंग्रेजी से खतरा है। हर भारतीय भाषा में अंग्रेजी प्रवेश कर रही है। सबसे बड़ा नुकसान हिंदी को है। हिंदी भाषी लोग विदेश में जाकर अंग्रेजी बोलते हैं। एक तरह से यह प्रवृत्ति अपनी भाषा को नष्ट कर रही है। विश्व के कई देश अपनी भाषा में तरक्की कर रहे हैं। जब तक भारतीय भाषाओं में विज्ञान और तकनीक को नहीं पढ़ेंगे। कोई भी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं ला सकते हैं। न ही कोई आविष्कार कर पाएंगे।
भाषा को भाषा की दृष्टि से देखना होगा
त्रिभाषा में हिंदी को लेकर कुछ प्रदेशों में विरोध का कोई औचित्य नहीं है। नई शिक्षा नीति में यह स्वीकारा गया है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में जल्दी सीखते हैं। किसी भी भाषा को एक भाषा की दृष्टि से देखना होगा। उच्च शिक्षा की भी पढ़ाई अगर भारतीय भाषाओं में हो तो यह सभी के लिए बेहतर होगा। भाषा की लड़ाई में एक विदेशी भाषा पर आश्रित होना ठीक नहीं है।
संस्कृत पढ़ने वाले बढ़ेंगे
त्रिभाषा के तहत हिंदी प्रदेश में संस्कृत को पढ़ाने का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं, जबकि विश्व के कई देश संस्कृत को पढ़ रहे हैं। संस्कृत एक प्राचीन भाषा है, जिसके शब्द कई भाषाओं में मिलते हैं। उम्मीद है कि त्रिभाषा फामरूले में हिंदी भाषी क्षेत्रों में बच्चे संस्कृत पढ़ेंगे।
अतिथि के विचार
त्रिभाषा फामरूले के तहत स्कूलों में विद्यार्थियों को तीन भाषाओं की शिक्षा दी जानी थी। हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को तीन भाषाएं हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा पढ़ाई जानी थी। गैर हिंदी भाषी राज्यों में मातृभाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई और यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा है। तीन भाषा वाले इस फामरूले को तमिलनाडु को छोड़कर सभी राज्यों ने लागू किया था। हिंदी प्रदेशों में आधुनिक भारतीय भाषा की जगह छात्रों ने संस्कृत पढ़नी शुरू की, जिसे लेकर दक्षिण के तमिलनाडु जैसे राज्य में विरोध रहा कि वे हिंदी नहीं पढ़ेंगे क्योंकि हिंदी प्रदेशों में कोई तमिल नहीं पढ़ता। 

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Posted By: Taruna Tayal

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