विनय विश्वकर्मा, मेरठ। मेहनत-लगन के साथ-साथ उत्पाद की गुणवत्ता भी व्यवसाय में कामयाबी का मुख्य कारक है। अमित ने इस फार्मूला को समझा भी और व्यवसाय में भी अपनाया। एमबीए के बाद नौकरी की लेकिन रम नहीं पाए। नौकरी छोड़ी और महज एक किलो केंचुआ खरीदकर वर्मी कंपोस्ट का काम शुरू किया। गुणवत्ता से समझौता नहीं किया, लिहाजा बाजार में पकड़ बन गई। सुनकर हैरत हो सकती है कि आज उनका दो करोड़ रुपये का सालाना कारोबार है।

हरिद्वार से एक किलो केंचुआ खरीदे: मेरठ निवासी अमित त्यागी ने 1994 में गाजियाबाद से एमबीए किया था। इसके बाद फार्मा कंपनी में नौकरी की। कुछ ही दिनों में नौकरी से मन भर गया। पत्नी मोनिका त्यागी ने कृषि में रोजगार तलाशने के लिए प्रेरित किया लेकिन न तो उनके पास अपना मकान-दुकान थी और न कृषि भूमि। मोनिका ने 1994 में शांतिकुंज हरिद्वार से एक किलो केंचुआ खरीदे। इसी के साथ काम शुरू कर दिया गया।

तीन एकड़ जमीन में 350 वर्मी बेड लगाए: अमित बताते हैं कि उन्होंने गढ़ रोड स्थित किनानगर में तीन एकड़ जमीन में 350 वर्मी बेड लगाए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलियाई ब्रीड आइसेनिया फेटिडा के केंचुओं से खाद तैयार करते हैं। खाद की छनाई व पैकिंग के बाद इसे सजग इंटरनेशनल ब्रांडनेम से बाजार में लाया गया। यह खाद नर्सरी, घरेलू बागवानी, खेत, पॉली हाउस आदि में प्रयोग होती है। खाद की आपूर्ति देशभर में की जाती है। इसे बनाने में प्रति किलो तीन रुपये लागत आती है जबकि बिक्री छह से 20 रुपये प्रति किलो तक हो जाती है।

स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया करा रहे: वह बताते हैं कि फिलहाल सालाना टर्न ओवर दो करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। अमित 14 राज्यों के छह हजार से अधिक किसानों को केंचुआ खाद बनाने का प्रशिक्षण दे चुके हैं, जबकि स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया करा रहे हैं। बताते हैं, केंचुआ खाद में गोबर खाद की अपेक्षा तीन गुना अधिक पोषक तत्व होते हैं। इसे काला सोना भी कहा जाता है। बेरोजगार युवक रोजगार के तौर पर भी गोबर को एकत्र कर इसका व्यावसायिक उपयोग कर सकते हैं। जैविक कृषि को प्रोत्साहन के इस दौर में जैविक खाद की मांग देश ही नहीं दुनिया में भी दिनोंदिन बढ़ती जाएगी।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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