मेरठ, जागरण संवाददाता। मेरठ शहर खेल, शिक्षा और मेडिकल के क्षेत्र में अलग मुकाम रखता है। लेकिन जब नागरिक सुविधाओं और एक मुकम्मल शहर की बात होती है तो मेरठ पड़ोसी जिलों से भी पीछे छूट जाता है। बजबजाते खुले नाले, सड़क किनारे कचरे के ढेर, आधा-अधूरा सीवेज नेटवर्क शहर की छवि को धूमिल करते हैं। आवारा कुत्तों और बंदरों के हमलों से लोग परेशान हैं। अब आवारा पशु खुलेआम घूमते हैं और जनता पिंजरे में रहने को मजबूर। यूं तो बात उठी थी कि मेरठ को स्मार्ट सिटी बनाया जाए, लेकिन आम शहरी तो कम में भी संतोष करने को तैयार है। उसकी यही इच्छा है कि स्मार्ट न सही, संतोषजनक सिटी तो मेरठ जरूर हो। गंदगी और अव्यवस्था का आलम ही है कि दीपावली के बाद से लगातार मेरठ में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। मुख्यमंत्री जी! आज आप मेरठ में हैं। पश्चिमी उप्र की राजधानी कहे जाने वाले मेरठ के लोगों को उम्मीद है कि आप इन समस्याओं से निजात दिलाएंगे, बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराएंगे।

सीवेज नेटवर्क

शहर के 55 प्रतिशत हिस्से में सीवर लाइन नहीं पड़ी है। घरों से निकला सीवेज खुले नाले-नालियों में बहकर सीधे काली नदी में पहुंच रहा है। जल निगम ने प्रस्ताव भेज रखा है। शासन स्तर से शत-प्रतिशत सीवेज नेटवर्क बनाने के लिए निर्णय लेने की जरूरत है। साथ ही 220 एमएलडी एसटीपी की टेंडर प्रक्रिया में तेजी लाकर तय अवधि में कराने की जरूरत है। हालात इतने बुरे हैं कि बड़ी-बड़ी कालोनियों में सीवर लाइन ही नहीं पड़ी हैं। जहां डल भी गई हैं, उन्हें एसटीपी से जोड़ा तक नहीं गया है, लिहाजा गैर शोधित सीवेज खुले नालों में बहता है। एक महानगर की यह बदसूरत तस्वीर नगरीय व्यवस्था को आज भी मुंह चिढ़ाती है।

खुले नाले

शहर में 315 छोटे-बड़े खुले नाले हैं। इनमें ओडियन, आबूनाला-एक और दो समेत 14 खुले नाले जानलेवा हैं। शहर की आबादी के बीच से गुजरते हैं। इनमें गिरकर कई मासूमों की मौत हो चुकी है। नगर निगम दो बार नालों को ढकने का प्रस्ताव भेज चुका है। लेकिन शासन स्तर से निर्णय न हो पाने के कारण ये काम शुरू नहीं हो सका है।

आवारा कुत्ते व बंदरों का डर

शहर में एनिमल बर्थ कंट्रोल कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा है। इससे आवारा कुत्तों की आबादी में बेतहाशा वृद्धि हो गई है। वहीं, बंदरों की संख्या भी शहर में बढ़ गई है। आवारा कुत्तों की नसबंदी व एंटी रैबीज वैक्सीनेशन का अभियान चलाने के लिए शासन स्तर से सख्त कदम उठाने की जरूरत है। बंदरों को पकड़वा कर वन क्षेत्र में छोडऩे के लिए वन विभाग की अनुमति मिलने में तमाम अड़चनें आती हैं। इसका समाधान भी शासन स्तर से किया जाना जरूरी है। आवारा कुत्तों की समस्या से निदान को नगर निगम द्वारा उठाए गए कदम से अब आम शहरी भी नाउम्मीद हो चुका है। नसबंदी के लिए ओटी निर्माण के लिए लगभग तीन माह पहले टेंडर छोडऩे की प्रक्रिया शुरू की गई थी, उसकी स्थिति क्या है कोई नहीं जानता। ओटी बनने तक नगर निगम इस काम के लिए कैंट बोर्ड या सेना के आरवीसी की मदद भी ले सकता है, लेकिन कोई पहल तक नहीं की गई। अगर सरकार जनता की समस्याओं का निदान करना चाहती है, तो इस दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे। कांजी हाउस का मुद्दा छेडऩा भी अब बेमानी-सा लगता है।

जल निकासी

शहर की बड़ी समस्या है। छोटे-बड़े नालों की संख्या भले ही 315 है, लेकिन जलनिकासी मुकम्मल नहीं है। बागपत रोड से जुड़े निचले इलाकों में जलनिकासी के छोटे नाले-नालियों की कमी है। बड़े नालों की सफाई कभी पूरी नहीं हो पाती है। बिन बारिश के ही लिसाड़ी रोड, माधवपुरम समेत कई मोहल्लों में जलभराव की स्थिति रहती है। ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने की पहल शासन स्तर से हो तो स्थिति सुधर सकती है।

कूड़ा प्रबंधन व निस्तारण

शहर में 900 मीट्रिक टन ताजा कूड़ा प्रतिदिन उत्सर्जित होता है। इसमें से लगभग 600 मीट्रिक टन कूड़े का ही उठान प्रतिदिन नगर निगम कर पाता है। लेकिन शहर में ताजा कूड़े के निस्तारण के लिए एक भी प्लांट नहीं है। नगर निगम ने गांवड़ी में ताजा कूड़े के निस्तारण के लिए प्लांट लगाने का प्रस्ताव शासन को भेज रखा है। इस पर शासन स्तर से निर्णय होना है। इसी तरह पुराना कूड़ा लोहिया नगर, गांवड़ी, मंगतपुरम, कंकरखेड़ा मार्शल पिच में डंप है। लोहिया नगर और गांवड़ी में पुराने डंप कूड़े के निस्तारण के लिए प्लांट हैं। 10 घंटे प्रतिदिन चलने पर दोनों कूड़ा निस्तारण प्लांट से लगभग 450 मीट्रिक टन कूड़े का निस्तारण हो पाता है। लेकिन अन्य स्थानों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। वहीं, घर-घर से कूड़ा एकत्र कर डंङ्क्षपग ग्राउंड तक कूड़ा पहुंचाने के लिए डोर टू डोर कूड़ा गाड़ी भी पर्याप्त नहीं है। शहर को कम से कम 300 कूड़ा गाडिय़ों की दरकार है। लेकिन मौजूद 160 ही हैं।

बेसहारा पशुओं के लिए आश्रय केंद्र

शहर में बेसहारा पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। नगर निगम की कान्हा उपवन नाम से एक गोशाला परतापुर में है। यहां लगभग 500 गोवंशी मौजूद हैं। इसकी क्षमता भी इतनी है, जबकि अनुमान के अनुसार शहर में लगभग 800 बेसहारा पशु होंगे। इनको भी आश्रय केंद्र की दरकार है। बेसहारा पशु सड़क पर घूम रहे हैं। आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं। इलाज का उचित प्रबंध न होने से बेसहारा पशुओं को उपचार भी समय से नहीं मिल पाता है।

हाईकोर्ट बेंच : खंडपीठ बनाइए, सस्ता-सुलभ न्याय दिलाइए

मेरठ : सस्ता और सुलभ न्याय सरकारों के एजेंडे में रहता है, लेकिन पश्चिमी उप्र में यह आजादी के बाद से अब तक बेमानी है। जब भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग छह करोड़ से ज्यादा लोगों को सस्ता-सुलभ न्याय की खातिर खंडपीठ बनाने की मांग की जाती है, केंद्र राज्य तो राज्य सरकार केंद्र और कभी सुप्रीम कोर्ट तक के पाले में गेंद डाल दी जाती है। मुख्यमंत्री पश्चिमी उप्र की राजधानी कहे जाने वाले मेरठ आ रहे हैं, ऐसे में इस क्षेत्र की जनता का दर्द उन्हें समझना चाहिए और आजादी के बाद से उठ रही हाईकोर्ट बेंच की मांग पर सरकार का रुख स्पष्ट कर इसके गठन की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। पश्चिम उप्र हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन तथा मेरठ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष महावीर सिंह त्यागी का कहना है कि बेंच की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्ताव पारित करने पर ही हो सकती है। बेंच के लिए सबसे पहला प्रस्ताव वर्ष 1955 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. संपूर्णानंद द्वारा केंद्र सरकार को भेजा गया था। दूसरा प्रस्ताव वर्ष 1968 में गया। मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने भी प्रस्ताव भेजा था। बेंच के लिए आंदोलन वर्ष 1978 में शुरू हुआ। 1981 से तो लगातार 22 जनपदों में प्रत्येक सप्ताह शनिवार को हड़ताल की जा रही है। 

Edited By: Prem Dutt Bhatt