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बच्चों का आक्रामक व्यवहार सिर्फ अनुशासनहीनता नहीं! मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक व सामाजिक और कभी-कभी कारण चिकित्सकीय भी

By Amit Tiwari Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Tue, 03 Nov 2026 05:30 AM (IST)

बच्चों में आक्रामक व्यवहार केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, सामाजिक और चिकित्सकीय कारणों का परिणाम हो सकता है। विशेषज्ञों ...और पढ़ें

(प्रतीकात्मक फोटो)

(प्रतीकात्मक फोटो)

HighLights

  1. आक्रामक व्यवहार मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, सामाजिक कारणों का परिणाम।

  2. आवेग नियंत्रण की कमी, पछतावे का अभाव चिंताजनक लक्षण।

  3. स्कूल, अभिभावक मिलकर बच्चों की सुरक्षा, भावनात्मक विकास पर करें काम।

जागरण संवाददाता, मेरठ। हरियाणा के पंचकुला स्थित एक स्कूल परिसर में एक छात्र द्वारा छात्रा की बेरहमी से पिटाई करने का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित होने के बाद बच्चों के व्यवहार, उनकी मानसिक स्थिति और स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। इस घटना ने अभिभावकों, शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं को केवल अनुशासनहीनता मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों के आक्रामक व्यवहार के पीछे मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, सामाजिक और कभी-कभी चिकित्सकीय कारण भी हो सकते हैं।

क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट डा. सीमा शर्मा ने प्रसारित वीडियो को विचलित करने वाला बताते हुए कहा कि इस तरह के व्यवहार के पीछे पहला संभावित कारण बच्चों में इंपल्स कंट्रोल यानी आवेगों पर नियंत्रण की समस्या हो सकती है। ऐसे बच्चों में जब कोई उद्वेग या भावना पैदा होती है तो वे उस पर नियंत्रण नहीं रख पाते। मस्तिष्क की वह अनुशासित प्रक्रिया विकसित नहीं हो पाती, जो किसी भावना या प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करती है। ऐसे में बच्चे अपने आवेगों के अनुसार व्यवहार करने लगते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका संबंध केवल आक्रामकता से नहीं, बल्कि डर और अन्य सकारात्मक-नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से भी हो सकता है।

डा. शर्मा ने दूसरी संभावना बच्चों में रिमोर्सलेसनेस यानी गलत व्यवहार के बाद पछतावे और अपराधबोध का अभाव बताया। कहा कि बच्चों का किसी व्यक्ति या पशु के प्रति क्रूर व्यवहार करना और सामने वाले की पीड़ा, रोने या तकलीफ से प्रभावित न होना गंभीरता से देखने की जरूरत है। हालांकि ऐसे मामले बहुत छोटे प्रतिशत में सामने आते हैं, लेकिन यदि बच्चे में लगातार इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो विशेष निगरानी और विशेषज्ञों की मदद जरूरी है। समय रहते पहचान और उचित मार्गदर्शन नहीं मिलने पर व्यवहार संबंधी समस्याएं आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती हैं।

स्टेरायड के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं कारण
डा. सीमा शर्मा ने एक अन्य चिकित्सकीय पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि कुछ बच्चे श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण स्टेरायड दवाओं का सेवन करते हैं। स्टेरायड रेज इसका एक ज्ञात संभावित दुष्प्रभाव है। ऐसी स्थिति में सामान्य गुस्सा असामान्य आक्रामक प्रतिक्रिया में बदल सकता है। उस समय सोचने-समझने की क्षमता पर भावनात्मक आवेग हावी हो सकता है। इसलिए बच्चे के व्यवहार का आकलन करते समय उसकी दवाओं और मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी लेना भी जरूरी है।

डा. शर्मा ने बच्चों पर डिजिटल और सामाजिक वातावरण के प्रभाव को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार हिंसक फिल्में, वीडियो और मारपीट वाले दृश्य देखने से बच्चों में नकल करने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है, लेकिन हर बच्चा ऐसा व्यवहार नहीं करता। गंभीर क्रूरता की नकल के पीछे पहले से मौजूद आवेग नियंत्रण की कमजोरी जैसे कारक भी हो सकते हैं। इसलिए केवल मोबाइल या फिल्मों को इस तरह की घटनाओं का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा।

स्कूलों में सुरक्षा के साथ भावनात्मक समझ भी जरूरी : सपना आहूजा
सीबीएसई सिटी कोआर्डिनेटर सपना आहूजा ने कहा कि इस तरह की घटनाएं समाज के लिए चिंता का विषय हैं और इन्हें रोकने के लिए स्कूल, अभिभावक और समाज को मिलकर काम करना होगा। स्कूल केवल शिक्षा देने का स्थान नहीं, बल्कि बच्चों का दूसरा घर है। यहां उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। केवल अनुशासन सिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझना भी जरूरी है। सुझाव दिया कि स्कूलों में खाली कक्षाओं को खुला न छोड़ा जाए। 3

लंच और छुट्टी के समय शिक्षकों की ड्यूटी निर्धारित हो। छोटे और बड़े बच्चों के ब्लाक, शौचालय और लंच टाइम अलग-अलग रखे जाएं। कक्षाओं, गलियारों, सीढ़ियों और खाली पड़े कमरों के आसपास सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनकी नियमित निगरानी हो। प्राथमिक और जूनियर कक्षाओं के बच्चों को बिना किसी जिम्मेदार अटेंडेंट के अकेले खाली कमरों या परिसर के संवेदनशील हिस्सों में जाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। बच्चों के लिए नियमित काउंसलिंग, क्रोध नियंत्रण और अच्छे-बुरे व्यवहार की समझ विकसित करने पर जोर दिया जाए।

सिर्फ कैमरे लगाने से नहीं रुकेगी हिंसा : डा. वाग्मिता त्यागी
गार्गी गर्ल्स स्कूल की प्रधानाचार्य डा. वाग्मिता त्यागी ने कहा कि समाज में हो रहे बदलावों के बीच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अभिभावकों और स्कूल दोनों की है। बच्चों को गलती करने पर लगातार डांटना या प्रताड़ित करना उचित नहीं है। अभिभावक अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि कई बार यह भी नहीं देख पाते कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है और उस सामग्री का उसके कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

कहा कि स्कूलों में केवल कैमरे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेना सबसे बड़ी भूल है। कैमरा किसी वारदात को रोक नहीं सकता, वह घटना के बाद केवल सबूत देने का काम करता है। अभिभावक और शिक्षक दोनों बच्चों का भला चाहते हैं, लेकिन जब तक दोनों एक-दूसरे की भूमिका का सम्मान करते हुए संवाद नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाओं को रोकना मुश्किल होगा।

बच्चों को समय, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव देना जरूरी : संजीव अग्रवाल
बीएनजी इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य संजीव अग्रवाल ने बच्चों के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ने के पीछे पारिवारिक वातावरण, संवाद की कमी, डिजिटल दुनिया और भावनात्मक उपेक्षा को महत्वपूर्ण कारण बताया। कहा कि बच्चों को गलतियों पर अत्यधिक डांटने और सजा देने से वे अपनी बातें छिपाने लगते हैं। इसलिए अभिभावकों को बच्चों की बात सहानुभूति के साथ सुननी चाहिए और उन्हें भरोसा दिलाना चाहिए कि गलती होने पर भी परिवार उनके साथ खड़ा है।

सुझाव दिया कि माता-पिता हरदिन कम से कम 30 से 45 मिनट बच्चों को बिना किसी व्यवधान के दें। उनके दोस्तों, दिनभर की गतिविधियों और भावनाओं पर बातचीत करें। केवल फीस, भोजन और सुविधाएं उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बच्चों को स्नेह और भावनात्मक जुड़ाव भी चाहिए। बच्चों के लिए रोजाना कम से कम एक घंटे मैदानी खेल, सीमित स्क्रीन टाइम और किताबों, ड्राइंग, बोर्ड गेम जैसे विकल्प उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

हिंसा केवल अनुशासनहीनता नहीं, सामाजिक और शैक्षिक चुनौती : वीके मिश्रा
दीवान पब्लिक स्कूल के प्रधानाचार्य वीके मिश्रा ने कहा कि हाल की घटनाएं केवल बच्चों के बीच विवाद या अनुशासनहीनता नहीं हैं, बल्कि समाज के सामने गंभीर सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षिक चुनौती हैं। एक घटना में छात्र द्वारा छात्रा की पिटाई और दूसरी घटना में चंडीगढ़ में पूरी कक्षा के विद्यार्थियों द्वारा एक छात्र को पीटने की खबरें इस बात का संकेत हैं कि बच्चों के भावनात्मक और नैतिक विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

कहा कि बच्चों के व्यवहार पर पारिवारिक वातावरण, हिंसक डिजिटल कंटेंट, सहानुभूति की कमी, साथियों का दबाव और संवाद का अभाव असर डाल सकते हैं। किसी भी परिस्थिति में दूसरे बच्चे को पीटने या समूह बनाकर उस पर हमला करने का औचित्य नहीं हो सकता। हिंसा करने वाले बच्चों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन उनके व्यवहार के पीछे के कारणों को समझकर सुधार का रास्ता भी तैयार करना होगा।

उन्होंने स्कूलों में सम्मान, सहानुभूति और जिम्मेदार व्यवहार पर नियमित चर्चा, प्रशिक्षित काउंसलर, गोपनीय शिकायत व्यवस्था और बुलिंग व शारीरिक हिंसा के खिलाफ स्पष्ट जीरो टालरेंस नीति लागू करने की जरूरत बताई। बच्चों को एंगर मैनेजमेंट, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और डिजिटल नागरिकता की शिक्षा दी जानी चाहिए।

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