मेरठ। पश्चिमी उप्र के आधा दर्जन जिले एवं महानगर में फेरबदल की उम्मीदें धुंधला रही हैं। नई दिल्ली से लेकर लखनऊ तक चल रही खींचतान से क्षेत्रीय इकाई ठिठक गई है। खासकर, क्षेत्रीय टीम बनने के बाद तमाम चेहरे नाराज हैं, जबकि उनकी पैरवी में दिग्गजों ने घेराबंदी तेज कर दी है। लोकसभा चुनाव में अभी वक्त होने की वजह से बदलाव की हवा भी थम सकती है।

हाल ही में क्षेत्रीय अध्यक्ष अश्विनी त्यागी ने पश्चिम क्षेत्र की घोषणा की थी, जिसमें उन्होंने जातीय समीकरण साधने की पूरी कोशिश की। लेकिन, तमाम वरिष्ठों को दरकिनार करते हुए मोहित बेनीवाल को महामंत्री बनाने व कई अन्य को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। तीनों महामंत्री गाजियाबाद व नोएडा में रहते हैं, जबकि पश्चिमी उप्र में 19 जिले शुमार होते हैं। सहारनपुर व मुरादाबाद समेत तमाम जिलों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। इधर, मोर्चो और प्रकोष्ठों की घोषणा भी अटकी हुई है। प्रदेश संगठन महामंत्री कई बार गाजियाबाद आ चुके हैं, लेकिन फेरबदल के नाम पर वह भी कोई रास्ता नहीं ढूंढ पाए। इधर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, गाजियाबाद के जिलाध्यक्षों ने भी तेवर दिखाकर पार्टी का आत्मबल डगमगा दिया।

बदलें भी तो कैसे

तमाम वजहों से क्षेत्रीय इकाई जिला एवं महानगर की कमान नए चेहरों को देने में हिचक रही है। जिलाध्यक्ष शिवकुमार राणा का जाना तय था, लेकिन राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश से रिश्ते व तीन स्थानीय विधायकों के समर्थन से उनकी पैरवी फिर मजबूत मानी जा रही है। चर्चा है कि तीन विधायक क्षेत्रीय अध्यक्ष अश्विनी त्यागी की घेरेबंदी में जिलाध्यक्ष शिवकुमार राणा के लिए लखनऊ तक घूम आए। इन विधायकों पर लगे आरोपों के बचाव में शिवकुमार भी उतर चुके हैं। उधर, अश्विनी त्यागी को सांसद का धुर विरोधी माना जाता है। इन्हीं वजहों से पार्टी के अंदर बदलते समीकरणों के तहत अश्विनी त्यागी ने सांसद के विरोधी व विधायक संगीत सोम की आम पार्टी में शिरकत की। पूर्व विधायक अमित अग्रवाल भी क्षेत्रीय अध्यक्ष के साथ रिश्तों को साधते नजर आए हैं। उधर, संघ के कई पसंदीदा नामों को क्षेत्रीय टीम में खास तवज्जो नहीं मिली। ऐसे में बदलाव की डगर कठिन होती जा रही है। अगर मोर्चा व प्रकोष्ठ घोषित करने में ज्यादा वक्त लगा तो महानगर अध्यक्ष करुणेश नंदन गर्ग व राणा को जीवनदान मिल सकता है। हालांकि इन दोनों को लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी बढ़ी है।

Posted By: Jagran