मेरठ, जेएनएन। कोरोना की वजह से लघु, कुटीर, मध्यम उद्योगों यानी एमएसएमइ के सामने कई तरह की चुनौतियां रहीं हैं। कई महीने उद्योग बंद भी रहे। अब एक फरवरी को बजट आ रहा है, तो उससे उद्यमियों की भी आस जुड़ी हुई है। जीएसटी की प्रक्रिया में उलझनों की वजह से उद्यमियों को अभी भी परेशानी हो रही है। एमएसएमई मामलों के जानकार सीए पवन मित्तल बताते हैं कि सरकार को जीएसटी की जटिल प्रक्रिया को और आसान बनाने की जरूरत है। उन्होंने बजट से कुछ मांग भी सुझाएं हैं।

ये है बजट से मांग

रिटर्न और टैक्स में समानता

जीएसटी में कई तरह के फार्म भरने की वजह से एकाउंटिंग का खर्चा बढ़ता जा रहा है। जीएसटी की रिटर्न तो तीन महीने में भरने की सुविधा मिली है, लेकिन टैक्स माहवार भरना पड़ रहा है। इससे बिलिंग में कई तरह की समस्या आ रही है। इन दोनों में समानता होनी चाहिए। जो उद्यमी दूसरे उद्यमी से कोई बिजनेस कर रहे हैं तो उसमें नए तरह के फार्म का इनवाइस भरना पड़ रहा है। इससे अनावश्यक बोझ बढ़ गया है।

कम हो जटिलता

पांच करोड़ से अधिक वार्षिक टर्नओवर वाले बड़े उद्यमी को मासिक जीएसटी रिटर्न है, वहीं इससे कम वाले को क्वार्टरली भरना है। दोनों उद्यमी आपस में भी कारोबार करते हैं, इसकी वजह से पूरा सिस्टम उलझाने वाला है। सभी के लिए एक तरह की प्रक्रिया होनी चाहिए। वहीं क्रेडिट लेजर सिस्टम के तहत सेटेलमेंट न होन की वजह से उद्यमी को जीएसटी का एक फीसद कैश में सरकार को जमा कराना पड़ रहा है। यह खत्म होना चाहिए ।

तिथियों में समानता

जीएसटीआर टू ए और टू बी की तारीख अलग- अलग होने से भी एमएसएमई परेशान हैं। टू ए में खरीददार के सभी बिल दिखाई देते हैं, टू बी में दिखने वाले बिल पर उद्यमी को लाभ मिलता है। इसमें बिल सबमिट करने की तिथि महीने की 11 तारीख है। इस तिथि के बाद टू बी में बिल नहीं दिख पा रहा है। जिसका लाभ नहीं मिल रहा है। टू ए और टू बी को एक में मिला देना चाहिए।

टैक्स कलेक्शन सोर्स खत्म हो

टैक्स कलेक्शन सोर्स के तहत 0.75 फीसद खरीददार से टैक्स एकत्रित कराकर सरकार को जमा कराना भी चुनौतीपूर्ण है, इसे खत्म किया जाना चाहिए। साथ ही आयकर की स्लैब को भी कम करना चाहिए।

ये कहते हैं उद्यमी

माल उधार जा रहा है लेकिन जीएसटी पहले देना पड़ रहा है। जीएसटी रिटर्न तीन महीने का कर दिया गया है लेकिन हर महीने टैक्स देना ही पड़ रहा है। इसे खत्म किया जाना चाहिए। स्पोट्र्स गुड्स पर जीएसटी खत्म होना चाहिए। या फिर पांच फीसद से अधिक नहीं होना चाहिए। आयकर का स्लैब भी कम किया जाए।

पुनीत मोहन शर्मा, डायरेक्टर, रामा रबर इंडस्ट्रीज

कोरोना की वजह से उद्योगों के सामने चुनौती रही है। उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सब्सिडी का प्रावधान किया जाना चाहिए। कोविड के समय में कई योजनाएं आईं लेकिन सब कागज पर ही रह गईं। बजट में टैक्स के स्लैब को कम करके कुछ राहत दी जा सकती है।

मनीष प्रताप, पार्टनर, बीपीआर कोल्ड स्टोरज एंड आइस फैक्ट्री  

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