विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बेहद खास है मथुरा का पेड़ा: खोये से बनी मिठाई नहीं, ये है ब्रज की पहचान और मंदिरों का मुख्य प्रसाद

Published: Sun, 13 Sep 2026 08:53 AM (IST)

Famous Sweet Of Mathura: मथुरा का पेड़ा सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि ब्रज की पहचान और मंदिरों का मुख्य प्रसाद ...और पढ़ें

मथुरा का पेड़ा।

मथुरा का पेड़ा।

HighLights

  1. मथुरा का पेड़ा ब्रज की पहचान, मंदिरों का मुख्य प्रसाद है।

  2. खोये से बनी यह मिठाई ब्रज की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण करती है।

  3. 1832 से प्रसिद्ध, अब जीआई टैग के लिए पंजीकृत हो रहा है।

जागरण संवाददाता, मथुरा। सुबह की धूप अभी चढ़ी नहीं है। शहर की पुरानी गलियों में मंदिर की घंटियां बज रही हैं। बाीच में राधे-राधे की पुकार सुनाई देती है। इस बीच किसी मिठाई की दुकान से आती एक खास खुशबू हवा में घुलती है। कदम अनायास उसी ओर मुड़ जाते हैं। सामने बड़े कड़ाह में दूध पक रहा है। कलछी लगातार चल रही है।

कड़ाही के किनारों पर जमती मलाई को खोया बनाने के बाद चीनी मिलाई जाती है। हथेली पर खोये की गर्माहट, उंगलियों की हल्की हरकत और देखते ही देखते एक गोल पेड़ा तैयार।

हथेलियों में आकार लेती खुशबू

पेड़ा ब्रज के लिए केवले मिठाई नहीं है, यह प्रसादी है। मंदिरों में लगने वाले भोग का एक मुख्य हिस्सा। यह ब्रज की पहचान का वह स्वाद है, जिसे आंखें बंद करके भी पहचाना जा सकता है। मथुरा आएं और पेड़ा नहीं खाया तो मानो यात्रा अधूरी रह गई। पेड़ा मुंह में घुलते ही खोये की खुशबू महसूस होती है। पेड़ा खत्म होने के बाद भी उसका स्वाद जीभ पर ठहरा रहता है, पर मन कहता है, अरे भाई,, एक और।

मुंह में घुलते ही अंतर्मन तक पहुंचती है मिठास

होलीगेट निवासी मोहनलाल शर्मा कहते हैं कि मथुरा के पेड़े की असली शोभा दुकानों से ज्यादा उन यात्रियों के हाथों में दिखाई देती है, जो यहां से लौटते समय पेड़े के डिब्बे प्रसाद के तौर पर साथ ले जाते हैं। कोई स्वजन के लिए, कोई दोस्तों के लिए, कोई प्रसाद के रूप में और कोई सिर्फ इसलिए कि ब्रज की यह मिठास घर तक पहुंचाना चाहता है। मथुरा में पेड़ा की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलता।

shrikhand

श्रीखंंड।।

भोग के लिए मंदिरों में होता है प्रयोग

विश्राम घाट पर दक्षिणमुखी हनुमानजी मंदिर के सामने गुसाईं पेड़े वालों की दुकान सबसे पुरानी मानी जाती है। यह दुकान 1832 में स्थापित हुई। वैष्णव और वल्लभ शाखा से जुड़े भक्त भोग के लिए यहीं से प्रसाद खरीदते थे।

यह भी पढ़ें- हेमा मालिनी का साक्षात्कार: यमुना शुद्धिकरण से मेट्रो तक मथुरा का विजन, जानिए सांसद के बड़े लक्ष्य

यह भी पढ़ें- राधाष्टमी मेला बरसाना: मंगला आरती को 500 पास, बाइक व ई-रिक्शा बैन; 25 लाख श्रद्धालुओं के लिए विशेष तैयारी

इसके बिना ब्रज की आध्यात्मिक यात्रा अधूरी

आज शहर में ब्रजवासी, राधिका, शंकर, भरतपुरिया और कालीचरन जैसी प्रतिष्ठित दुकान और ब्रांड मौजूद हैं। अतुल्य भारत में भी मथुरा के पेड़े को स्थान मिला है। इसे जीआइ टैग के लिए पंजीकृत कराने की प्रक्रिया चल रही है।