वृंदावन के पौराणिक यमुना घाट: कृष्ण लीलाओं के साक्षी, अब अस्तित्व की तलाश में; हर घाट की अपनी कहानी
वृंदावन के पौराणिक यमुना घाट, जो कभी कृष्ण की लीलाओं के साक्षी थे, अब यमुना के दूर होने और संरक्षण ...और पढ़ें

मथुरा- वृंदावन के यमुना किनारे प्राचीन केशीघाट। - फोटो: जागरण।
HighLights
वृंदावन के 40 पौराणिक घाट कृष्ण लीलाओं से जुड़े हैं।
कालियदह घाट पर कृष्ण ने कालिय नाग का मर्दन किया।
यमुना के दूर होने से अधिकांश घाट अस्तित्व खो रहे हैं।
संवाद सहयोगी, वृंदावन (मथुरा)। यमुना की लहरें भले ही आज कई घाटों से दूर चली गई हों, लेकिन उनकी सीढ़ियों पर कृष्ण की लीलाओं की स्मृतियां आज भी ठहरी हैं। कहीं कन्हैया ने कालिय नाग का मर्दन किया था तो कहीं गोपियों संग चीरहरण की लीला रची। किसी घाट पर ग्वालबालों संग भोजन करने की कथा जुड़ी है, किसी के किनारे राधारानी के साथ महारास की स्मृतियां जीवंत हैं। वृंदावन में यमुना किनारे ऐसे करीब 40 पौराणिक घाटों का उल्लेख मिलता है।
राजाओं ने कभी इनकी महत्ता को समझकर इन्हें भव्य स्वरूप दिया, लेकिन समय के साथ यमुना के दूर होने और संरक्षण के अभाव में अधिकांश घाट आज अपने अस्तित्व की तलाश में हैं।
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कालीयदह घाट
कालीयदह घाट भगवान श्रीकृष्ण की कालिय नाग मर्दन लीला का साक्षी है। कथा है कि यमुना में कालिय नाग के विष से जल विषैला हो गया था। सखाओं की गेंद यमुना में जाने पर कृष्ण उसे निकालने के लिए नदी में कूद पड़े। कालिय नाग से युद्ध के बाद भगवान ने उसके फनों पर नृत्य किया और उसे यमुना छोड़ने के लिए विवश किया।
चीरघाट में गोपियों की लीला
शृंगारवट से लगा चीरघाट गोपियों और श्रीकृष्ण की लीला से जुड़ा है। मान्यता है कि गोपियां यहां यमुना स्नान कर कात्यायनी देवी का व्रत करती थीं। इसी स्थान पर भगवान ने गोपियों के वस्त्र कदंब वृक्ष पर रखकर उन्हें नदी में नग्न स्नान न करने का संदेश दिया।
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विहारघाट : सखाओं संग भोजन की लीला
बाराहघाट से वृंदावन की ओर बढ़ने पर विहारघाट आता है। मान्यता है कि गोचारण के दौरान श्रीकृष्ण बलराम और ग्वालबालों के साथ यमुना किनारे यहां बैठकर भोजन करते और लीलाएं करते थे। इसी कारण इसे विहारघाट कहा गया।
बाराहघाट से केशीघाट तक बिखरी हैं स्मृतियां
दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित बाराहघाट भगवान बाराह की स्मृति से जुड़ा है। इसके समीप गौतम ऋषि के आश्रम की मान्यता भी है। वहीं वृंदावन के प्रमुख केशीघाट पर भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे घोड़े के रूप में आए केशी दैत्य का वध किया था। यही कारण है कि इसे केशीघाट कहा गया।
अधिकांश घाटों की पहचान अब छतरियों तक सिमटी
मदनटेर, रामगोपाल, नाभा, आंधेर, भ्रमर, सूरज, युगल, धीरसमीर, जगन्नाथ, राधा, करौली, नागरीदास, भीम, गोविंद और हिम्मत बहादुर समेत अनेक घाटों का उल्लेख वृंदावन की पुरानी परंपराओं में मिलता है। कभी यमुना की धारा इन घाटों की सीढ़ियों को छूती थी। यमुना के दूर होने के साथ कई घाट मिट्टी और अतिक्रमण की परतों में दब गए।


