मथुरा की धार्मिक धरोहर शिवताल: यहां भगवान श्रीकृष्ण ने शिव को दिए थे दर्शन, औरंगजेब ने खंंडित किया था शिवलिंग
मथुरा का शिवताल जल संरक्षण, स्थापत्य और आस्था का एक अनूठा संगम है, जो ब्रज के अतीत का साक्षी है। ...और पढ़ें

मथुरा का शिवताल।
HighLights
शिवताल जल संरक्षण, स्थापत्य और आस्था का प्रतीक है।
प्राकृतिक जल स्रोत से पोषित यह ताल ऐतिहासिक महत्व रखता है।
भगवान शिव और श्रीकृष्ण से जुड़ी है इसकी लोककथा।
जागरण संवाददाता, मथुरा। ब्रज का इतिहास केवल बड़े मंदिरों और प्रसिद्ध घाटों में ही नहीं छिपा है, पुराने ताल, कुंड, मार्ग और बाजार भी ब्रज के अतीत के साक्षी हैं। शिवताल इसी विरासत का ऐसा अध्याय है, जिसमें जल संरक्षण, स्थापत्य और आस्था तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। सौंख अड्डा क्षेत्र के गुरुनानक नगर में स्थित इस ताल की चर्चा लंबे समय से मथुरा के प्राचीन धार्मिक स्थलों में होती रही है।
यह चतुर्भुज आकार का गहरा ताल है, जो ऊंची दीवारों और प्लेटफार्म से घिरा हुआ है। यहां का शांत वातावरण अनायास की लोगों को आकर्षित करता है। सबसे खास बात यह है कि इस ताल में आसपास के किसी नाले या किसी घर का अवशिष्ट पानी नहीं आता, बल्कि यहां प्राकृतिक जल स्रोत हैं, जहां से पानी ऊपर आता है और इन्ही जल स्रोत से वर्षा जल भूजल में मिल जाता है। इस तरह से यह ताल अपने समय की दीर्घकालिक निर्माण योजना की सफलता की कहानी कहता है।
जल संरक्षण, स्थापत्य और आस्था का संगम है यह ताल
शिवताल के निर्माण के साथ धार्मिक लोककथा जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान शिव ने श्रीकृष्ण के दर्शन की इच्छा से मथुरा में इस प्राकृतिक जल स्रोत के निकट तपस्या की थी। लंबे समय तक प्रतीक्षा के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहां शिव को दर्शन दिए और तभी से इस स्थान को शिवताल कहा जाता है। जहां तपस्या की वहां एक वर्तमान में एक शिव मंदिर है। यहां एक प्राचीन खंडित शिवलिंग भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि औरंगजेब ने मथुरा पर हमले के दौरान तोड़ दिया था।

शिवताल।
प्राचीन धरोहरों के पीछे छिपी लोक कल्याण की भावना
शिवताल की सबसे खास विशेषता इसका पक्का निर्माण और इसकी सीढ़ीनुमा संरचना है। ताल के चारों ओर बनी बुर्जियां यह संकेत देती है कि इसके निर्माण में केवल जल संचयन को ही ध्यान में नहीं रखा गया था, बल्कि इसे धार्मिक गतिविधियों और जन उपयोग के लिए भी व्यवस्थित रूप दिया गया था। यहां दो शिलालेख मिलते हैं।
शिलालेख में राजा पटनीमल का नाम
एक शिलालेख में राजा पटनीमल का नाम विशेष रूप से सामने आता है। इसमें संवत 1864 में इसके लोकार्पण और धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख किया गया है। उर्दू शिलालेख के आधार पर इसके जीर्णोद्धार की तिथि 1222 हिजरी बताई गई है। पटनीमल परिवार का मथुरा की धार्मिक धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह भी कहा जाता है कि ताल का निर्माण मकराई के राजा ने कराया था और बाद में बनारस के सेठ पटनीमल ने इसका जीर्णोद्धार कराया।
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यहां नहीं आता घरों या नालों का पानी
शिवताल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका प्राकृतिक जलस्रोत है। स्थानीय लोगों के अनुसार ताल में आसपास के नालों या घरों का अवशिष्ट पानी नहीं आता। प्राकृतिक स्रोतों से निकलने वाला जल यहां एकत्र होता है। सदियों पहले बनाई गई यह संरचना केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं रही होगी, बल्कि जल संचयन और संरक्षण की उस दूरदर्शी सोच का उदाहरण भी है।
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ताल के चारों ओर बनी बुर्जियां और पक्के घाट इसके निर्माण की व्यापक दृष्टि का संकेत देते हैं। जल के साथ धार्मिक अनुष्ठानों, आवागमन और जन उपयोग को भी ध्यान में रखकर इसे आकार दिया गया।
नियमित हो यहां की सफाई
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि ताल की नियमित सफाई, जलस्रोत का संरक्षण, सीढ़ियों और घाटों का जीर्णोद्धार, प्रकाश व्यवस्था और आसपास स्वच्छता पर ध्यान दिया जाए तो शिवताल को महत्वपूर्ण धार्मिक और विरासत पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
शिवताल मथुरा परिक्रमा मार्ग में आने वाले प्रमुख स्थानों में शामिल रहा है। यहां का प्राकृतिक जलस्रोत कितना पुराना है, यह कोई नहीं जानता। यहां भगवान शिव ने दो हजार वर्ष तक तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थल का नाम शिवताल पड़ा।
महेश्वरनाथ चतुर्वेदी, स्थानीय निवासी
