शरद पूर्णिमा: लक्ष्मी भ्रमण और श्रीकृष्ण महारास का दिव्य महत्व, ग्रंथों में मिलता है महात्म्य का वर्णन
शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है, जब माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों संग महारास किया था।

मथुरा-वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित उत्सव माला ग्रंथ की प्रतिलिपि में शरद रास का उल्लेख दर्शाते पत्रक जो महाराज सावंत सिंह ने लिखा। फोटो: शोध संस्थान द्वारा
HighLights
शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मीजी ने पृथ्वी का भ्रमण किया।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों संग महारास रचाया।
चंद्रमा की किरणों में अमृत तत्व बरसता है।
जागरण संवाददाता, मथुरा। शरद पूर्णिमा की रात सोलह कलाओं से परिपूूर्ण चंद्रमा की धवल चांदनी में लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार होकर अपने हाथों में वर और अभय लिए पृथ्वी पर भ्रमण करने निकली थीं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शरद पूर्णिमा की रात वंशीवट पर गोपियों संग महारास किया तो इस तिथि का महत्व और भी बढ़ गया। इसीलिए शरद पूर्णिमा को महारास की पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की श्वेत धवल चांदनी में विष्णुप्रिया माता लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार होकर पृथ्वी लोक पर भ्रमण के लिए निकली थीं। परंतु धार्मिक मान्यता है कि अश्विन मास की पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा की अद्भुत दिव्य रासलीला भी इसी रात को हुई थी।
शास्त्रों के अनुसार, माता लक्ष्मी का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था, इसलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। कुंआरी कन्याएं इस दिन सुबह सूर्य और चंद्रदेव की पूजा करके मनचाहा वर की प्राप्ति की कामना करती हैं।
डॉ. शर्मा ने बताया श्रीमद्गीता में उल्लेख है कि अश्विन पूर्णिमा की रात सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है पुष्पामि औषधि: सर्वा: साोमो भूत्वा रसात्यमक:।। मतलब मैं रस स्वरूप अर्थात अमृतमय चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियों को पुष्ट करता हूं। इस रात में चंद्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है एवं चंद्रमा की किरणों में अमृत तत्व बरसता है।
पांडुपिलियों में शरद पूर्णिमा का वर्णन
वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित उत्सव माला ग्रंथ में किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह ने शरद रास का उल्लेख किया है। महाराज सावंत सिंह (नागरीदास) ये काव्य रचा गया। जो प्रतिलिपि संस्थान में सुरक्षित है। नागरी दास ने अपने काव्य शरद पूर्णिमा का उल्लेख किया है।
सूरदास ने गाई महारास की महिमा
महाकवि सूरदास ने वंशीवट पर तो लिखा है कि वंशीवट सौ वट नहीं.. नंदगांव सौ गांव...। इसीलिए भक्तिकाल के प्रमुख संत चैतन्य महाप्रभु भी वृंदावन आगमन के दौरान नित्य यहां आकर कृष्ण भक्ति में लीन हो जाते थे। मान्यता है कि उनके शिष्य गदाधर पंडित के शिष्य मधु पंडित ने भी वंशीवट की सेवा की थी। इससे प्रसन्न होकर राधा गोपीनाथ महाराज ने उनको दर्शन दिए।
इन पुराणों में भी उल्लेख
भगवान श्रीकृष्ण के 'महारास' का उल्लेख मुख्य रूप से प्रमुख पुराणों में मिलता है-
- श्रीमद्भागवत महापुराण: यह महारास और रासलीला के वर्णन के लिए सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। दशम स्कंध (पूर्वार्द्ध) के लगभग 29वें से 33वें अध्याय तक शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों के साथ किए गए महारास का अत्यंत विस्तृत, भक्तिपूर्ण और दार्शनिक वर्णन मिलता है।
- ब्रह्मवैवर्त पुराण: ब्रह्मवैवर्त पुराण में रासलीला का बहुत ही अलौकिक एवं विस्तृत विवरण है। इसके कृष्ण जन्मखंड और प्रकृति खंड के अंतर्गत महारास का प्रसंग मिलता है।
- विष्णु पुराण: विष्णु पुराण के पंचम भाग में भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल, वृंदावन की लीलाओं और रासक्रीड़ा का वर्णन मिलता है।
- गर्ग संहिता: गर्ग संहिता में श्रीकृष्ण की लीलाओं का पुराणों की ही भांति समग्र वर्णन है। इसके वृंदावन खंड में महारास और रासमंडल का अत्यंत सुंदर व विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। इसी क्रम में भक्तिकाल के दौरान रासपंचाध्यायी शीर्षक से ब्रजभाषा रचनाएं मिलती हैं, जो खूब लोक ग्राही हुईं।
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