वृंदावन (मथुरा), जागरण संवाददाता। विलुप्त प्राय हो चुकी सांझी कला में नया सवेरा लेकर आया ब्रह्मकुंड पर आयोजित होने वाला सांझी मेला। करीब पांच साल पहले तक सांझी केवल कुछ मंदिरों तक सांझी उत्सव सीमित रह गए थे। लेकिन पांच साल पहले ब्रह्मकुंड पर एक बार फिर से शुरू हुए पौराणिक सांझी मेला ने लोगों में जागरूकता ला दी। अब न केवल मंदिर, घर बल्कि स्कूलों तक सांझी कला को पहुंचा दिया है।

ब्रज फाउंडेशन और ब्रज संस्कृति शोध संस्थान द्वारा ब्रह्मकुंड पर आयोजित सांझी मेले का आकर्षण सिर चढ़ कर बोला। रविवार को सांझी प्रतियोगिता में न केवल कलाकारों बल्कि विद्यार्थियों ने भी आकर्षक सांझी बनाकर दर्शकों को मुग्ध कर दिया। भाजपा नेता उदयन शर्मा ने कहा इस सांझी मेले का उद्देश्य बालकों के मन में सांझी कला के प्रति प्यार पैदा करने का है। मेले की बढ़ती प्रसिद्धि और इसमें भाग लेने वाले कलाकारों की संख्या ने आयोजन की सफलता साबित कर दी। ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के सचिव लक्ष्मी नारायण तिवारी ने कहा आज सांझी कला की प्रसिद्धि इतनी है कि अनेक विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं इस पर शोध कार्य कर रहें हैं। सांझी प्रतियोगिता में भाग ले रहे 45 प्रतिभागियों ने मन को मोह लेने वाली सांझियों का प्रदर्शन किया। योगेंद्र छोंकर, प्रियव्रत शर्मा, करुणेश उपाध्याय, गौरव गोला, एनएल शर्मा, जेपी सारस्वत, मनसुख सिंह, आनंद यादव, श्यामसुंदर पाठक, रामप्रकाश यादव, गोपाल मैथिल, नंदकिशोर मौजूद रहे। संचालन गोपाल शरण शर्मा ने किया। -शोधार्थियों का विषय बनी सांझी कला-

ब्रज की सांझी कला ब्रज में ही नहीं बल्कि बाहर भी फैलने लगी है। आज इस कला पर अनेक शोधार्थी शोध कर रहें है। ऐसी ही बड़ौदा की शोध छात्रा सांझी के तथ्य जुटाने मेले में पहुंची। सयाजीराव गायकवाड़ विवि की एमफिल छात्रा साक्षी ने न सिर्फ सांझी कलाकारों से बात की बल्कि खुद भी सांझी बनाने में सहयोग किया। लक्ष्मी नारायण तिवारी ने उन्हें सांझी के ऐतिहासिक संदर्भ, देवालयी सांझी परंपरा और लोक में विस्तारित सांझी कला के बारे में जानकारी दी। सांझी स्टेंसिल का जादूगर संजय- सांझी श्रमसाध्यता से भरा कार्य है। जिसमें धैर्यता, समर्पण भाव जरूरी है। मथुरा के प्रयागघाट निवासी कलाकार संजय सोनी कला की पारंपरिकता बनाए रखने के साथ-साथ नए प्रयोग किए। इन्होंने सांझी के स्टेंसिल भी बनाए। जडिया घराने के नाम से विख्यात संजय के परबाबा भैंरोमल जडिया ने रंगजी के मंदिर में स्थित सोने के खंभे पर सोना जड़ने का कार्य किया था। आठ वर्ष की अवस्था से ही संजय ने इस कला को अपनाया। संजय जल सांझी, फूल सांझी व सूखे रंग की सांझी को बड़ी कुशलता के साथ बनाते हैं।

Posted By: Jagran

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