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राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु का मथुरा दौरा: गिरिराजजी का 11 KG गाय के दूध से पंचामृत अभिषेक, विशेष छबरिया में भेंट होगा 56 भोग

Published: Sat, 14 Mar 2026 08:36 AM (IST)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के प्रस्तावित गोवर्धन आगमन को लेकर दानघाटी धाम में विशेष तैयारियां चल रही हैं। 21 मार्च को ...और पढ़ें

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रसिक शर्मा, गोवर्धन। ब्रज की आस्था के प्रमुख केंद्र दानघाटी धाम में इन दिनों विशेष उत्साह और तैयारियों का माहौल है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के प्रस्तावित गोवर्धन आगमन को लेकर मंदिर परिसर में भक्ति और परंपरा के अनुरूप विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

गिरिराजजी को 56 प्रकार के व्यंजनों से सजी विशेष छबरिया का भोग अर्पित किया जाएगा, जिसे बाद में महामहिम को भेंट किया जाएगा।

11 किलो गाय के दूध से पंचामृत अभिषेक करेंगी राष्ट्रपति

सेवायत रामेश्वर पुरोहित के अनुसार राष्ट्रपति के 21 मार्च को दानघाटी मंदिर आगमन पर सेवायत दीपू पुरोहित व दिनेश चंद द्वारा महामहिम को मंत्रोच्चारण के बीच सर्वप्रथम गिरिराजजी का 11 किलो शुद्ध गाय के दूध से अभिषेक कराया जाएगा। इसके बाद दूध, दही, बूरा, शहद और गंगाजल से बने पंचामृत से विधिवत पूजा अर्चना होगी।

गोल्फकार्ट में बैठकर गोवर्धन पर्वत की 21 किमी की परिक्रमा करेंगी

अभिषेक के उपरांत प्रभु को सुगंधित इत्र अर्पित कर ग्वाल-वस्त्र समर्पित किए जाएंगे और श्रद्धापूर्वक 56 भोग की छबरिया अर्पित की जाएगी। साथ ही गिरिराजजी की प्रसादी चुनरी ओढ़ाकर महामहिम का सम्मान किया जाएगा। इसके उपरांत राष्ट्रपति गोल्फकार्ट में बैठकर गोवर्धन पर्वत की 21 किमी की परिक्रमा करेंगी।

प्रसादी चुनरी ओढ़ाकर किया जाएगा सम्मान

राष्ट्रपति के आगमन को देखते हुए प्रशासन ने आसपास के क्षेत्रों में साफ सफाई, रंगाई पुताई तथा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने का कार्य तेज कर दिया है। ब्रज की आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम माने जाने वाले दानघाटी धाम में विराजमान गिरिराजजी को स्वयं गोवर्धन पर्वत का स्वरूप माना जाता है। इसी गिरिराज की 21 किलोमीटर परिक्रमा करने हर वर्ष लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से गोवर्धन पहुंचते हैं और अपनी परिक्रमा का शुभारंभ प्रायः दानघाटी धाम से ही करते हैं।

ये है धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों से माखन-दही का दान मांगा था, जिससे यह स्थल ‘दानघाटी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वर्ष 1957 में स्थापित यह मंदिर आज स्वर्ण कलश, चांदी के द्वार और भव्य सिंहासन से सुसज्जित होकर ब्रज की भक्ति परंपरा का गौरवपूर्ण प्रतीक बन चुका है।