ब्रजरज में विलीन हुए रमेश बाबा, अंतिम यात्रा में उमड़ी हजारों की भीड़; नम आंखों के बीच गूंजा राधे...कृष्ण
पद्मश्री रमेश बाबा की अंतिम यात्रा बरसाना में निकली, जिसमें हजारों भक्तों ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। माताजी ...और पढ़ें

रमेश बाबा के अंतिम संस्कार में जुटे लोग।
संवाद सहयोगी, बरसाना (मथुरा)। आंखें नम थीं, हृदय भारी था, लेकिन अधरों पर राधे-कृष्ण का जाप था। इसी भक्ति और विरह की धुन के बीच ब्रज के विरक्त संत पद्मश्री रमेश बाबा की बुधवार को अंतिम विदाई यात्रा निकली। तीन किलोमीटर तक हजारों भक्त बाबा के डोले के साथ पैदल चलते रहे।
मानपुर से शुरू हुई यात्रा ब्रह्मांचल पर्वत की परिक्रमा करते हुए बरसाना पहुंची तो अपने लाडले बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए पूरा बरसाना उमड़ा। पुष्प अर्पित करते हुए ब्रजवासियों की आंखों से आंसू बहते रहे। हर ओर एक ही अनुभूति थी, बाबा चले गए, लेकिन उनकी भक्ति और सेवा की विरासत यहीं रह गई।

रमेश बाबा की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब।
मान मंदिर आश्रम के महंत और माताजी गोशाला के संस्थापक 88 वर्षीय रमेश बाबा ने मंगलवार को बीमारी के चलते अंतिम सांस ली थी। बाबा की इच्छा थी कि जीवन की अंतिम सांस भी ब्रजरज में ही निकले। इसी संकल्प के कारण उन्होंने मान मंदिर को ही अपने उपचार का केंद्र बना लिया था। निधन के बाद उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए मान मंदिर के रस मंडप में रखा गया।
पूरी रात हरिनाम संकीर्तन गूंजता रहा और भक्त नम आंखों से अपने संत के अंतिम दर्शन करते रहे। बुधवार सुबह आठ बजे अंतिम यात्रा के लिए बाबा का डोला सजाया गया। मान मंदिर की बालिकाएं बैंड-बाजों के साथ राधाकृष्ण का जाप करती हुई चल रही थीं। बरसाना में श्रद्धालुओं ने पुष्प अर्पित कर बाबा को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद यात्रा माताजी गोशाला पहुंची, जहां अंतिम दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ा।
मान मंदिर गुरुकुल की बालिकाओं के आंसू बता रहे थे कि उन्होंने बहुत कुछ खो दिया है। माताजी गोशाला में गाय के गोबर से तैयार चिता पर बाबा के पार्थिव शरीर को रखा गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मान मंदिर के अध्यक्ष रामलजी लाल शास्त्री ने मुखाग्नि दी। अंतिम संस्कार के दौरान संतों, हजारों ब्रजवासियों और अनुयायियों की आंखें नम रहीं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रतिनिधि के रूप में गन्ना विकास एवं चीनी मिल मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण भी बाबा को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। बाबा की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब मानो कह रहा था कि संत देह से विदा होते हैं, लेकिन उनकी साधना, सेवा और संकल्प ब्रज की मिट्टी में हमेशा जीवित रहते हैं।
