अजय शुक्ला, वृंदावन। लखनऊ घराने के कथक को अपने बीस वर्ष की साधना में सूफीज्म से जोड़कर सूफी-कथक के रूप में एक नई विधा को जन्म देने वाली मंजरी चतुर्वेदी मानती हैं कि शास्त्रीय नृत्य सीधे ईश्वर से जुड़ा आध्यात्मिक आनंद का स्त्रोत है। कथक जहा साकार ईश्वर के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है, वहीं सूफी नृत्य निराकार परमात्मा से साक्षात्कार कराता है। यह महज मनोरंजन नहीं है।

वृंदावन के राधारमण मंदिर में पहली बार नृत्य सेवा प्रस्तुत करने आई मंजरी चतुर्वेदी ने 'जागरण' से बातचीत में कहा कि हमें इस बात पर शोध करने की आवश्यकता है कि आखिर रास नृत्य क्या है। यदि खोजेंगे तो पाएंगे कि कथक और राधा रास में अधिक भेद नहीं मिलेगा। राधा के कृष्ण प्रेम, मीरा की भक्ति और राबिया के सूफी्रज्म में शरीर में होते हुए आत्मा के नृत्य और परमात्मा से मिलन की आध्यात्मिक अनुभूति है। शास्त्रीय नृत्य में आत्मा नृत्य करती है, देह में उसका वाहय प्रस्फुटन मात्र दृष्टिगोचर होता है। सूफी-कथक की अवधारणा भी इसी से जुड़ी है।

मंजरी पूछती हैं कि आखिर वृंदावन में राधे-राधे क्यों कहते हैं। कान्हा राधा के बाद आते हैं। यह नारी अस्मिता की हमारी सास्कृतिक विरासत को इंगित करता है। साथ ही वह यह भी कहती हैं कि आज पूरी दुनिया भारतीय शास्त्रीय नृत्य सीखना चाहती हैं। पश्चिम में देखें तो बैले और जैज पर ही सारे शोध हो रहे हैं जबकि हमारे यहा कथक, भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी, उपशास्त्रीय और लोक संगीत की श्रेष्ठ परंपरा है, लेकिन हम इसमें न तो शोध कर रहे हैं और न ही ऐसे संस्थान विकसित कर रहे हैं जो इन डास फार्म को और समृद्ध करें। हमें अपने नृत्य और संगीत पर 'डबल सेंस आफ प्राइड' का भाव पैदा करना होगा। पूरी दुनिया इसमें रुचि ले रही है और भारतीय नृत्य कला व संगीत सीखने को बेचैन है। जबकि हम इसे सिर्फ रोजगार से जोड़कर ही सीख रहे हैं। ले रहे हैं, दे नहीं रहे हैं।

Posted By: Jagran

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