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कंगन बेचकर मां ने थमाया धनुष, 'उधार के तीरों' से सोने पर निशाना साध रही मथुरा की ऋतु शर्मा

Published: Wed, 16 Sep 2026 12:34 PM (IST)Updated: Wed, 16 Sep 2026 12:40 PM (IST)

मथुरा की तीरंदाज ऋतु शर्मा ने पिता की मृत्यु और गरीबी के बावजूद अपनी मां के त्याग से प्रेरित होकर ...और पढ़ें

मथुरा की ऋतु शर्मा।

मथुरा की ऋतु शर्मा।

HighLights

  1. पिता की मृत्यु के बाद माँ ने कंगन बेचकर धनुष खरीदा।

  2. ऋतु ने उधार के तीरों से राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते।

  3. अब अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने और परिवार को गरीबी से निकालने का लक्ष्य।

जागरण संवाददाता, मथुरा। अड़ींग स्थित मथुरा तीरंदाज अकादमी के मैदान पर पसरा सन्नाटा। हवा को चीरती हुई प्रत्यंचा की टंकार। 12 वीं में पढ़ने वाली ऋतु शर्मा धनुष पर तीर चढ़ाकर अपनी उंगलियों की पकड़ मजबूत करती हैं। सामने 70 मीटर दूर लगे गोल बोर्ड के अलावा एक और मंजर उनकी पुतलियों में तैर रहा है। मां की वह खाली कलाई, जहां कभी सोने के कंगन हुआ करते थे। पिता की मृत्यु के बाद जिन्हें बेच कर उनकी मां ने धनुष खरीदा। वहीं धनुष जो अब लगातार सोने पर निशाने लगा रहा है।
मथुरा की प्रोफेसर कॉलोनी के एक साधारण घर से निकली ऋतु की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि अभावों के खिलाफ जंग लड़ते एक पूरे परिवार की है।

पिता की मृत्यु के बाद मां के हौंसले को हथियार बना साधा अभावों पर निशाना

रतनलाल फूलकटोरी स्कूल में नौ वर्ष की उम्र से ही ऋतु को तीरंदाजी खेल रही हैं। करियर उठान पर था तभी डेढ़ साल पहले पिता का साया सिर से उठ गया। घर में बुजुर्ग बाबा की पेंशन है, जिससे अकादमी की सात हजार रुपये महीने की फीस जैसे-तैसे चुकता होती है। मां सुमन शर्मा गृहिणी हैं, जिनके पास बेटी के हौसले के अलावा कोई जमा-पूंजी नहीं बची थी।

महंगी आती है तीरंदाजी किट

तीरंदाजी के आधुनिक उपकरण तीन से चार लाख रुपये में आते हैं; सिर्फ 12 तीरों का एक सेट ही 65 हजार रुपये का पड़ता है। जब धनुष का 90 हजार का हैंडल बदलना जरूरी हुआ, तो मां ने बिना सोचे अपने कंगन बेच दिए। ऋतु की मां कहती हैं कि बेटी के खेल उपकरण काफी महंगे आते हैं। प्रतियोगिताओं में आने-जाने व रहने का खर्चा भी उन्हें ही उठाना पड़ता है।

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राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक स्वर्ण व दो कांस्य जीत आगे की तैयारी में जुटी हैं ऋतु

ऋतु के कोच योगेंद्र सिंह राणा बताते हैं कि वह साथी खिलाड़ियों के पुराने और उधार के तीरों से निशाना साधती हैं। इन्हीं घिसे हुए तीरों और टूटे संसाधनों के दम पर उन्होंने स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया और नेशनल रैंकिंग आर्चरी टूर्नामेंट में राष्ट्रीय पदक जीतकर सबको चौंका दिया। अब भी सबसे उदयीमान खिलाड़ियों में से ऋतु एक हैं। कम बोलने वाली ऋतु अभ्यास के दौरान माथे से टपकते पसीने को पोंछते हुए फिर से कमान खींचती हैं।

 

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आगामी कटरा नेशनल रैंकिंग टूर्नामेंट

अंतरराष्ट्रीय पदक की चाह बनाए ऋतु के सामने आगामी कटरा नेशनल रैंकिंग टूर्नामेंट है और खेल विभाग में चार लाख रुपये की आर्थिक मदद की फाइल अब भी दफ्तरों के चक्कर काट रही है। ऋतु की तीखी नजरें जब लक्ष्य पर टिकती हैं, तो यह सिर्फ एक मेडल की चाहत नहीं होती। यह उस मां की सूनी कलाई को वापस संवारने और अपने परिवार को गरीबी के भंवर से बाहर निकालने की मूक प्रतिज्ञा होती है।