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अब एक घंटे देर से जागेंगे बांकेबिहारी, रात में भी जल्दी करेंगे शयन; दर्शन समय में बदलाव

By Vipin Parashar Edited By: Prateek Gupta
Published: Tue, 03 Nov 2026 07:36 PM (IST)

वृंदावन के ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में भाईदूज से सर्दी की दिनचर्या लागू होगी, जिससे दर्शन के समय में बदलाव होगा। ...और पढ़ें

ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में दर्शन को उमड़ी भीड़।

ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में दर्शन को उमड़ी भीड़।

संवाद सहयोगी, वृंदावन। मौसम में घुलती ठंडक का असर अब आराध्य ठाकुर बांकेबिहारीजी की सेवा में भी नजर आएगा। सर्दी में घर के बच्चों को जिस तरह देर तक रजाई से बाहर नहीं निकाला जाता, उसी वात्सल्य भाव से ठाकुरजी को भी अब एक घंटे अधिक विश्राम कराया जाएगा। दीपावली के बाद भाईदूज यानी 11 नवंबर से ठाकुरजी की दिनचर्या बदल जाएगी।

सुबह दर्शन एक घंटे देर से शुरू होंगे, जबकि रात में मंदिर के पट एक घंटे पहले बंद कर दिए जाएंगे। इसके साथ ही भोगराग और पहनावे में भी मौसमानुकूल बदलाव होगा। ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर के सेवायत श्रीनाथ गोस्वामी ने बताया कि मौसम परिवर्तन के साथ ठाकुरजी की सेवा में भी बदलाव किया जाता है। अब तक गर्मी की दिनचर्या के अनुसार सुबह 7.45 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक दर्शन होते थे।

भाईदूज से सुबह 8.45 बजे मंदिर के पट खुलेंगे और दोपहर 1:30 बजे तक दर्शन होंगे। शाम को दर्शन साढ़े चार बजे से शुरू होकर रात 8:30 बजे तक होंगे। अभी शाम साढ़े पांच बजे से रात 9:30 बजे तक दर्शन होते हैं। इस तरह सुबह और शाम दोनों समय में एक-एक घंटे का बदलाव होगा।

भोग में केसर, मेवा और गर्म पकवानों की बढ़ेगी मिठास

सर्दी के साथ ठाकुरजी के खानपान में भी गर्माहट बढ़ेगी। बालभोग में केसरयुक्त हलवा और लड्डू अर्पित किए जाएंगे। राजभोग में दूध-दही से बने तरल पदार्थों की मात्रा घटाकर सूखे मेवे और पकवान बढ़ाए जाएंगे। ठाकुरजी के प्रिय भोग गर्म दूध-भात का विशेष रूप से अर्पण होगा। शाम के उत्थापन भोग में गर्म पकौड़े और हलवा परोसा जाएगा, जबकि शयनभोग में केसरयुक्त दूध और सूखे मेवों की मात्रा बढ़ेगी।

हल्की पोशाक की जगह पहनेंगे गर्म वस्त्र

ठंड से बचाव के लिए ठाकुरजी अब हल्की पोशाक की जगह मोटे और गर्म कपड़ों से तैयार वस्त्र धारण करेंगे। मौसम के अनुरूप उनकी पूरी सेवा में बदलाव किया जाएगा। भक्तों के लिए यह बदलाव केवल समय परिवर्तन नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति वात्सल्य और लाड़-दुलार की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें ठाकुरजी को घर के बालक की तरह स्नेहपूर्वक रखा जाता है।

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