जागरण संवाददाता, मथुरा: महर्षि दयानंद सरस्वती जिला चिकित्सालय की ओपीडी में मंगलवार की सुबह डॉक्टर रोगियों की नब्ज पर हाथ रख बीमारी के एकाध लक्षण पूछते हैं। पर्चे पर कलम चलाई और कहते हैं जाओ चार दिन दवा खा लेना ठीक हो जाओगे। न हों तो अगली बार आकर दिखा लेना।

बाह्य रोग विभाग में उपचार कराने के लिए आ रहे रोगियों का जिला अस्पताल में इसी अंदाज में उपचार किया जा रहा है। एक रोगी पर डेढ़ मिनट से अधिक का समय डॉक्टर नहीं देते। सुबह आठ बजे से ओपीडी में मरीज देखे जा रहे हैं। यह क्रम दोपहर दो बजे तक चलेगा। एक-एक चिकित्सक के कक्ष के सामने डेढ़ सौ दो सौ मरीज लाइन लगाते हैं। एक बजे से पहले इक्का-दुक्का मरीज ही चिकित्सक कक्ष के बाहर नजर आते हैं। इस समय अवधि में डॉक्टर कभी-कभी बीच में उठकर कार्यालय और दूसरे कार्यों से भी चले जाते हैं। इतनी तेजी से रोगियों का परीक्षण कर उपचार किया जा रहा है। इससे रोगी संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन अधिकांश रोगियों के पास इतनी रकम भी नहीं है कि वह प्राइवेट डॉक्टर के यहां उपचार करा लें। यहां इलाज के लिए गरीब-मजदूर, मध्यम वर्ग के लोग अधिक आ रहे हैं। वहीं प्राइवेट क्लीनिक पर उपचार कराने के लिए रोगियों के परीक्षण और उपचार की तुलना की जाए तो प्राइवेट डॉक्टर एक रोगी का परीक्षण करने में दस से पंद्रह मिनट तक का समय दे रहा है। रोगी और उसके तीमारदार को बड़ी तसल्ली से सुन भी रहे हैं, लेकिन जिला अस्पताल में रोगी अपनी पूरी बीमारी तक डॉक्टर को नहीं बता पा रहा है और तीमरदार को तो कुछ भी कहने-सुनने का मौका तक नहीं दिया जा रहा है।

अलवर पुल के समीप से पेट में दर्द, उल्टी और सांस फूलने की दवा लेने के लिए आए शरीफ कुरैशी ने बताया कि डॉक्टर सुनते ही नहीं, दवा लिख देते हैं। वही दवा तीन महीने से चल रही है। कोई लाभ नहीं मिल रहा है। प्राइवेट में दिखाने के लिए पैसे नहीं हैं। मनोहरपुरा से आए मोहन ¨सह कर्दम ने बताया कि एक सप्ताह से बुखार आ रहा है। दवा से कोई लाभ नहीं मिल रहा है। अब तक वह डॉक्टर को तीन बार दिखा चुके हैं।

सीएमएस डॉ. वीके गुप्ता ने बताया कि जिला अस्पताल में चिकित्सकों की कमी चल रही है। चिकित्सक के पचास पद रिक्त हैं, लेकिन यहां सिर्फ 14 डॉक्टर तैनात हैं। एक-एक डॉक्टर को ओपीडी में कम से कम दो से ढाई सौ मरीज रोजाना देखने पड़ रहे हैं। रिक्त पदों पर चिकित्सकों की तैनाती के लिए शासन को कई बार लिखा गया है, लेकिन अभी तक रिक्त पदों पर तैनाती की कार्रवाई नहीं की गई है। जो भी डॉक्टर तैनात हैं, उनमें से कुछ को वीआइपी, जेल, बाल गृह की विजिट करने के लिए भी जाना पड़ रहा है।

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ट्रोमा सेंटर नहीं हो पा रहा शुरू: नीति आयोग ने हाल ही में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अपनी रिपोर्ट पेश की है। इसमें उत्तर प्रदेश की स्थिति बेहद खराब दर्शाई गई है। इसकी हकीकत तस्वीर जिला अस्पताल में देखने के लिए मिल रही है। यहां का ट्रोमा सेंटर लंबे अरसे से बंद पड़ा है, लेकिन शासन स्तर से इसको शुरू कराने को कोई भी पहल नहीं की जा रही है। इसी तरह से एनसीडी क्लीनिक में डॉक्टर तैनात नहीं है।

नहीं खुला आश्रय सदन: जिला अस्पताल के आपातकालीन भवन के पीछे बना रोगी आश्रय स्थल निष्प्रयोज्य पड़ा है। उसमें ताला लटका है।

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ये सुविधाएं: इमजेंसी, ओपीडी, पैथलोजी, ब्लड बैंक, एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, बर्न वार्ड, एनसीडी क्लीनिक, सीटी स्कैन सेंटर, मानसिक उपचार केंद्र, नेत्र लैंस प्रत्यारोपण, एफआइ-एआरटी सेंटर, एसटीडी क्लीनिक और 78 बैड, भोजन सुविधा।

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