रसिक शर्मा, गोवर्धन (मथुरा): राजा को प्रजा का संरक्षक कहा जाता है लेकिन यहां तो ब्रज के राजा को ही संरक्षण की दरकार है। हम बात कर रहे हैं गांव आन्यौर, जतीपुरा के बीच गोवर्धन पर्वत पर स्थित गिरिराजजी की शिला पर शेर के स्वरूप में विराजमान बलदाऊ की। यह एक मंदिर है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। इस मंदिर तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। शिलाओं पर चलकर ही मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

मान्यता के अनुसार चंद्र सरोवर में राधाकृष्ण और गोपियों के महारास की दिव्यता में ब्रज मंडल डूबा हुआ था। महारास यानी जितनी गोपियां थीं, उतने ही कृष्ण के स्वरूप थे। प्रत्येक गोपी कृष्ण के साथ नृत्य कर रही थी। कहा जाता है कि इस दौरान छह महीने तक चंद्रमा भी ठहर गए। महारास देखने का आकर्षण बलदाऊ को खींचने लगा। कृष्ण से बड़े होने के कारण बलदाऊ महारास में शामिल हो नहीं सकते थे। इस पर वे गोवर्धन पर्वत के ऊपर खड़े होकर महारास देखने लगे। इसी दौरान किसी गोपी की नजर पड़ी और उसने कहा कि देखो बलदाऊ खड़े हैं। गोपियां जैसे ही देखने लगी तो बलदाऊ शेर का स्वरूप धारण कर बैठ गए और सभी भ्रम समझ कर फिर रासलीला में लग गए। तभी से मान्यता है कि शेर के स्वरूप में श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ यहां विराजमान हैं। उसके बाद से बलदाऊ की यहां शेर के रूप में पूजा होने लगी। लेखपाल भेजकर जरूरत के अनुसार संरक्षण की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही अन्यौर जतीपुरा की गिर्राज कमेटी में भी यह प्रस्ताव रखा जाए।

अजय कुमार

गोवर्धन तहसील के नायाब तहसीलदार व जतीपुरा मुखारविंद मंदिर के रिसीवर

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