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युवाओं में संस्कृत का क्रेज: वृंदावन के 200 संस्थानों में 12 हजार छात्र, विदेशी स्टूडेंट्स भी आए

Published: Tue, 22 Sep 2026 02:11 PM (IST)

वृंदावन में तीन दशक बाद संस्कृत शिक्षा का पुनरुत्थान हुआ है, जहां भागवत कथावाचकों की प्रभावी जीवनशैली से प्रेरित होकर ...और पढ़ें

तीन दशक के बाद संस्कृत की पढाई को लेकर युवाओं में दिख रहा रुझान।

तीन दशक के बाद संस्कृत की पढाई को लेकर युवाओं में दिख रहा रुझान।

HighLights

  1. वृंदावन में तीन दशक बाद संस्कृत शिक्षा का पुनरुत्थान देखा जा रहा है।

  2. भागवत कथावाचकों की प्रभावी जीवनशैली युवाओं को संस्कृत की ओर खींच रही।

  3. वर्तमान में 200 संस्थानों में 12 हजार छात्र संस्कृत पढ़ रहे हैं।

विपिन, पाराशर, वृंदावन (मथुरा)। तीन दशक के बाद धर्मनगरी में एक बार फिर संस्कृत के पठन-पाठन ने जोर पकड़ा है। भागवत कथावाचकों की प्रभावी जीवन शैली ने युवाओं को इस ओर आकर्षित किया है। नए सिरे से शुरू हुए गुरुकुलों में संस्कृत की शिक्षा पाने को देश भर से युवा पहुंच रहे हैं।

इस समय छोटे-बड़े 200 संस्थान में 12 हजार विद्यार्थियों ने संस्कृत पढ़ने के लिए प्रवेश लिया है। इससे पहले, वृंदावन में संस्कृत पढ़ने की इच्छा लेकर आने वाले लोगों का उद्देश्य कर्मकांड, शादी-विवाह और याज्ञिक काम करना होता था।

वृंदावन वैदिक शिक्षा, संस्कृत व्याकरण, भागवत व कर्मकांड की शिक्षा का केंद्र रहा है। गुरुकुल शिक्षा परंपरा की शुरुआत 1965 में पुराणाचार्य श्रीनाथ शास्त्री ने वैदिक विद्यालय की स्थापना करके की और इसके बाद इस्कॉन संस्थापक श्रील प्रभुपाद ने 1976 में भक्तिवेदांत गुरुकुल की स्थापना की।

तीन दशक के बाद संस्कृत की पढ़ाई को लेकर युवाओं में दिख रहा रुझान

भक्तिवेदांत गुरुकुल के सहारे विदेशी भक्तों ने भी अपने बच्चों को वैदिक ज्ञान के लिए दाखिला दिलवाया। 2001 के आसपास जीवा इंस्टीट्यूट की शुरुआत हुई। तीन दशक पहले तक वृंदावन में पांच संस्कृत विद्यालय और तीन महाविद्यालय संचालित थे। जिले में संस्कृत के 40 विद्यालय थे। फिर, संस्कृत विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या गिरने लगी। सरकार ने भी ध्यान नहीं दिया। संस्कृत विद्यालयों में आचार्य नहीं रहे। छात्र कम हो गए। एक दशक पहले भागवत कथाकारों की धूम मची तो संस्कृत को लेकर रुझान लौटा। संस्कृत के नए निजी विद्यालय खुले।

देश विदेश के विभिन्न कोनों से आने वाले युवाओं को परीक्षा के बाद ही मिलता प्रवेश

अनिरुद्धाचार्य, आचार्य धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री, देवकीनंदन ठाकुर, देवी चित्रलेखा से प्रभावित छात्र भागवताचार्य बनने की इच्छा लेकर पढ़ने आने लगे। आज अकेले वृंदावन में ही छोटे-बड़े 200 विद्यालयों में 12 हजार छात्र संस्कृत पढ़ रहे हैं। इन विद्यालयों में वेद विद्यालय, गुरुकुल शामिल हैं। आवासीय सुविधा भी दी जा रही है। इनमें नेपाल, रसिया और देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्यार्थी शिक्षा ले रहे हैं।

ख्याति प्राप्त भागवताचार्यों से प्रभावित होकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं

चैतन्य विहार के वैदिक गुरुकुलम में भागवत प्रवचन शैली सीख रहे पटना के विष्णु दत्त गौड़ कथावाचन में देश-दुनिया में ख्याति प्राप्त भागवताचार्यों से प्रभावित होकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। गोधूलिपुरम के जयंती प्रसाद संस्कृत छात्रावास में अध्ययन कर रहे छपरा के दीपक शर्मा, माधव शर्मा, विवेक गौड़ भी कथा प्रवचन में भविष्य बनाने के लिए संस्कृत पढ़ने आए हैं। कथावाचक डा. मनोज मोहन शास्त्री कहते हैं, यह सिलसिला पिछले एक दशक में ही शुरू हुआ है। अधिकतर बालक भागवत कथा की शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा रखते हैं।

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'पहले हमारे संस्थान में लगभग 40 से 50 विदेशी ही वैदिक शिक्षा लेते थे। लेकिन, ये आंकड़ा बढ़कर अब 120 हो गया है और आनलाइन शिक्षा में तो लगभग पांच सौ विदेशियों को हर दिन वैदिक ज्ञान की पढ़ाई करवा रहे हैं।' डॉ. सत्यनारायण दास, संस्थापक: जीवा इंस्टीट्यूट, वृंदावन।

'वैदिक ज्ञान से जो आध्यात्मिक शांति मिलती है वह कान्वेंट की शिक्षा में नहीं है। मैं आत्मबोध करने के लिए भारत में वैदिक ज्ञान की जीवा इंस्टीट्यूट से शिक्षा ले रही हूं। इसके लिए बीते दो वर्ष से वृंदावन में ही निवास कर रही हैं।' विल्ली मूलर, जर्मनी।

'कॉन्वेंट की शिक्षा अर्थ आधारित है, उस शिक्षा से आत्मबोध नहीं होता, गीता की पढ़ाई की तो आत्मबोध के लिए वैदिक ज्ञान की ओर रुझान हुआ। जीवा इंस्टीट्यूट में वैदिक ज्ञान लेने के लिए वृंदावन आया हूं। यहां की पढ़ाई बेहतर है।' मारिया क्रिस्टामेल, फ्रांस।

'नेपाल से अधिकतर लोग बनारस अथवा वृंदावन में वैदिक शिक्षा लेने आते हैं। कई लोगों की यहीं नौकरी लग जाती है। जिनकी नहीं लगती वह नेपाल में कर्मकांड, कथा प्रवचन, धार्मिक अनुष्ठान करके जीवनयापन करते हैं। वृंदावन में नेपाल से पिछले कई दशकों से लगातार युवक वैदिक शिक्षा लेने आते रहे हैं।' प्रयास धिमरे, सिक्किम।

'नेपाल में संस्कृत की शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है, भागवत प्रवचन, कर्मकांड, वैदिक ज्ञान नेपाल की संस्कृति में शामिल है। नेपाल में सनातन संस्कृति के प्रचार प्रसार और वैदिक ज्ञान अर्जित करने को तीन वर्ष से वृंदावन में शिक्षा अध्ययन कर रहा हूं।' अनिकेत शर्मा, नेपाल।

वृंदावन में 2015 से फिर पुराना दौर लौटा है। वर्तमान में 12 हजार से अधिक युवा और किशोर वृंदावन के विभिन्न वेद विद्यालयों, गुरुकुलों में संस्कृत की शिक्षा ले रहे हैं। इनमें हजारों की संख्या में लड़कियां भी शामिल हैं। इनकी संख्या 2015 से पहले पांच या छह ही हुआ करती थी। वृंदावन में दो सौ अध्ययन केंद्रों में लगभग 120 छोटे वैदिक विद्यालय, 50 गुरुकुल, छह संस्कृत छात्रावास, लगभग 70 वेद विद्यालय, पांच सरकारी संस्कृत विद्यालय, तीन सरकारी संस्कृत महाविद्यालय शामिल हैं।

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आचार्य बनवारीलाल गौड़, संचालक: जयंती प्रसाद संस्कृत छात्रावास

कॉन्वेंट विद्यालयों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पढ़ाई का अधिक खर्च देख वैदिक शिक्षा की ओर विद्यार्थियों का आकर्षण बढ़ा। इस शिक्षा में प्रतिस्पर्धा नहीं है और आजीविका के लिए भी किसी पर निर्भरता कम ही रहती है। यही कारण है युवा और बालकों का रुख अब एक बार फिर वैदिक ज्ञान, कथा शैली की ओर हो रहा है।

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महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद, अखंड दयाधाम, वृंदावन।