आस्था के प्रतीक हैं ये 7 मंदिर: जानिए क्या हैं सप्तदेवालय? चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा 500 साल पुराना इतिहास
Mathura News: मथुरा के वृंदावन में स्थित सप्तदेवालय 500 साल पुरानी भक्ति, साधना और स्थापत्य की कहानी कहते हैं। चैतन्य ...और पढ़ें

Mathura News: सप्तदेवालय
HighLights
सप्तदेवालय 500 साल पुरानी आस्था और स्थापत्य दर्शाते हैं।
चैतन्य महाप्रभु के आगमन से भक्ति परंपरा विकसित हुई।
रूप गोस्वामी जैसे आचार्यों ने वृंदावन को साधना स्थली बनाया।
डिजिटल डेस्क, मथुरा। ब्रज के मंदिरों में दिनभर भक्ति धारा बहती है, करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पहले यही भूमि घने जंगलों से घिरी थी। चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमन के बाद यहां भक्ति की ऐसी परंपरा विकसित हुई, जिसने पूरे क्षेत्र की पहचान बदल दी। महाप्रभु के अनुयायी षड्गोस्वामी रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी और अन्य आचार्यों ने वृंदावन को साधना स्थली बनाया। इसी दौर में यहां मंदिरों की नींव पड़ी।
मदनमोहन, गोविंददेव, गोपीनाथ, राधारमण, राधादामोदर, राधाश्यामसुंदर और राधागोकुलानंद मंदिरों की परंपरा ने वृंदावन की भक्ति संस्कृति को विस्तार दिया। यही सप्तदेवालय आज भी पांच सदी पुरानी आस्था, साधना और स्थापत्य की कहानी कहते हैं।

मदनमोहन : सनातन गोस्वामी की साधना से जुड़ी परंपरा यमुना किनारे स्थित मदनमोहन मंदिर की कथा सनातन गोस्वामी की साधना से जुड़ी है। मान्यता है कि उन्होंने आदित्य टीले पर मदनमोहन विग्रह की सेवा आरंभ की। मुल्तान के व्यापारी रामदास कपूर से जुड़ी कथा के अनुसार यमुना में उनकी नाव फंसने और ठाकुरजी की कृपा से निकलने के बाद उन्होंने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। लाल पत्थरों से बने मंदिर की स्थापत्य शैली में उत्तर भारतीय नागर परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है। मुगल काल में मूल विग्रह करौली ले जाया गया।

गोविंददेव : पत्थरों में गढ़ी विराट स्थापत्य गाथा नगर निगम के समीप लाल पत्थरों से बना गोविंददेव मंदिर वृंदावन के स्थापत्य वैभव का प्रतीक है। रूप गोस्वामी की प्रेरणा से राजा मानसिंह द्वारा 16वीं शताब्दी में इसका निर्माण कराया गया। विशाल दीवारें, मेहराब और गुंबद इसकी भव्यता को दर्शाते हैं। मुगल काल में मंदिर को क्षति पहुंची और मूल विग्रह जयपुर ले जाया गया।

गोपीनाथ : यमुना तट की लाल पत्थर की स्मृति केशीघाट के निकट राधागोपीनाथ मंदिर वृंदावन के प्राचीन मंदिर स्थापत्य की पहचान है। मंदिर की परंपरा कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ से जुड़ी मानी जाती है। बाद में यह गौड़ीय संत परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बना। मुगल काल में विग्रह को पहले कामवन और फिर जयपुर ले जाया गया।

राधादामोदर : सात परिक्रमा में गिरिराज का भाव सेवाकुंज मार्ग स्थित राधादामोदर मंदिर में भक्ति और साधना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। रूप गोस्वामी ने यहां राधादामोदर विग्रह की प्रतिष्ठा की। मंदिर परिसर में संतों की भजन कुटिया और समाधियां साधना युग की स्मृतियां संजोए हैं। यहां की गोवर्धन शिला की सात परिक्रमा को भक्त गिरिराज जी की परिक्रमा के समान फलदायी मानते हैं।

राधारमण : शालिग्राम शिला से प्रकटे आराध्य राधारमण मंदिर की परंपरा गोपाल भट्ट गोस्वामी की साधना से जुड़ी है। मान्यता है कि शालिग्राम शिला से राधारमण लाल जू का प्राकट्य हुआ। निधिवन के समीप स्थित यह मंदिर आज भी गौड़ीय वैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र है।

राधाश्यामसुंदर और राधागोकुलानंद लोई बाजार स्थित राधाश्यामसुंदर मंदिर की परंपरा श्यामानंद प्रभु की साधना से जुड़ी है। मान्यता है कि राधारानी की कृपा से श्यामसुंदर विग्रह उन्हें प्राप्त हुआ। वहीं केशीघाट के निकट राधागोकुलानंद मंदिर में राधाविनोद, विजय गोविंदा, राधागोकुलानंद और चैतन्य महाप्रभु के विग्रहों की सेवा परंपरा है।
