यूपी में सपेरा समाज का अनोखा सुप्रीम कोर्ट: 3 तारीखों में फैसला, आरोपी की 'अग्नि परीक्षा' से न्याय
यह अनोखा न्याय दरबार 'अग्नि परीक्षा' जैसी परंपराओं और आर्थिक दंड या सामाजिक बहिष्कार जैसे निर्णयों के माध्यम से देशभर के सपेरा समुदाय को न्याय प्रदान करता है।

किशनी क्षेत्र के गांव नगला बील में इसी मंदिर पर सजता है न्यायालय। जागरण
HighLights
मैनपुरी में सपेरा समाज का 20 साल पुराना सर्वोच्च न्यायालय
विवादों का निपटारा अधिकतम तीन तारीखों में होता है
आरोपी की 'अग्नि परीक्षा' से न्याय का फैसला
जागरण संवाददाता, मैनपुरी। तपती सलाख भी सच्चे व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकती... इसी विश्वास के सहारे किशनी तहसील के नगला बील में सपेरा समाज का अपना न्याय दरबार करीब 20 वर्षों से फैसले सुना रहा है। यहां वकील कानून की किताबों के जानकार हैं न जज किसी न्यायिक डिग्री वाले, फिर भी देशभर के सपेरा समाज का भरोसा इस अदालत पर कायम है। विवाद कैसा भी हो, दोनों पक्षों की बात सुनकर अधिकतम तीन तारीखों में फैसला कर दिया जाता है। नगला बील में लगने वाली सर्वोच्च अदालत के निर्णय के बाद उसे मानना समाज में जरूरी माना जाता है।
केस एक : निचली कोर्ट में मामला न निपट पाने पर इस सुप्रीम कोर्ट में पिछले साल हरियाणा के गांव तिलपथ का एक मामला आया। मुख्य न्यायाधीश जोरावरनाथ ने आरोप सिद्ध होने पर आरोपित को समाज और गांव से बहिष्कृत करने का फैसला सुनाया। उसे गांव छोड़ना पड़ा।
केस दो : कन्नौज के थाना विशुनगढ़ के गांव रामलीला में हत्या के एक मामले में आरोप सिद्ध हो जाने पर इस सुप्रीम कोर्ट ने आरोपित पर 2400 रुपये का आर्थिक दंड लगाया और उसकी डेढ़ बीघा जमीन पीड़िता के नाम करने का फैसला सुनाया। आरोपित को फैसला मानना पड़ा।
केस तीन: राजस्थान की किशनगढ़ तहसील क्षेत्र के गांव मोढूका के दहेज हत्या के एक मामले में न्यायालय ने दूसरी तारीख में अंतिम फैसला सुनाया था। फैसला में आरोपित पक्ष के द्वारा पीड़ित पक्ष को एक लाख रुपये व युवक की दूसरी शादी न करने का आदेश दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय में देशभर से आते हैं सपेरा समाज के विवाद
करीब 2500 की आबादी वाले नगला बील में सपेरा समाज की ‘सपेरा सजातीय सर्वोच्च न्यायालय’ स्थापित है। देशभर से समाज के लोग अपने विवाद लेकर यहां पहुंचते हैं। मुख्य न्यायकर्ता जोरावरनाथ बताते हैं कि पहले सपेरा समाज के मामले अलग-अलग पंचायतों में निपटाए जाते थे। विवाद बढ़ने और पंचायतों के फैसलों से असंतोष के बाद समाज की न्याय परंपरा को कायम रखने के लिए सर्वोच्च पंचायत बनाने का निर्णय लिया गया। इस न्याय दरबार में हत्या, दुष्कर्म और युवती को भगाकर ले जाने जैसे गंभीर मामले भी आते हैं। निर्णय प्रक्रिया भी अनोखी है।
सर्वोच्च न्यायालय में गर्म सलाख से होती है आरोपी की अग्निपरीक्षा, सुनाया जाता है फैसला
आरोपी के हाथों में पीपल के सात पत्ते रखकर उनके ऊपर गर्म लोहे की मोटी छड़ रखी जाती है। इसके बाद उसे सात कदम चलना होता है। हाथ जलने पर दोषी माना जाता है। सजा के रूप में आर्थिक जुर्माने से लेकर समाज से बहिष्कार तक का निर्णय सुनाया जाता है। यहां न्याय की कसौटी सांच को आंच नहीं की मान्यता है।
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बदायूं के हरपालपुर में है उच्च न्यायालय
सपेरा समुदाय का हाईकोर्ट बदायूं जिले के ग्राम हरपालपुर में है। इसके अलावा कानपुर के नगला बरी, आगरा के मनियां और औरैया के पिपरी और मथुरा के छाता तहसील के गांव बसई खुर्द में हाईकोर्ट की खंडपीठ हैं। जब इन कोर्टों के फैसलों से वादी या प्रतिवादी संतुष्ट नहीं होते तब वह सुप्रीम कोर्ट नगला बील की शरण लेते हैं।
