जासं, मैनपुरी: डेंगू से शनिवार को बालक और एक युवक ने दम तोड़ दिया। वहीं फैल्सीपेरम से ग्रस्त संदिग्ध बालिका की हालत गंभीर बनी हुई है। बावजूद इसके स्वास्थ्य महकमा चुप्पी साधे बैठा है। डेंगू पर काबू पाने में नाकाम विभाग अब फैल्सीपेरम के संदिग्ध मरीज मिलने से सकते में आ गया है। मामले को छिपाया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक शासन को गोपनीय रिपोर्ट भेज दी गई है।

डेंगू का कहर कम नहीं हो रहा है। कुरावली थाना क्षेत्र के गांव नगला जसराम निवासी गुलशन (5) पुत्र महाराज सिंह को बुखार आने पर परिजनों ने रक्त जांच कराई। डेंगू की पुष्टि होने के बावजूद परिजन बच्चे का झोलाछाप से ही इलाज करा रहे थे। झोलाछाप के हाथ खडे़ करने के बाद जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां से बालक को सैफई रेफर कर दिया गया। यहां इलाज के दौरान बालक ने दम तोड़ दिया। उधर, उनके दूसरे पुत्र हेमसिंह (7) की भी तबियत बिगड़ गई। खून की उल्टियां होने पर भर्ती कराया गया है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मुनींद्र सिंह का कहना है कि टीम भेजकर बालक का परीक्षण कराया जा रहा है। दूसरी घटना में बिछवां थाना क्षेत्र के गांव पीरपुर निवासी राघवेंद्र (40) पुत्र लाल बहादुर को बुखार आने के बाद परिजन अस्पताल ले गए। जहां डेंगू की पुष्टि हुई। यहां लाभ न मिलने पर आगरा भर्ती कराया, जहां इलाज के दौरान शनिवार को उनकी मौत हो गई।

वहीं एलाऊ थाना क्षेत्र के गांव देवीदासपुर निवासी शिखा (नौ) पुत्री राजकुमार और दन्नाहार थाना क्षेत्र के गांव नगला अखई निवासी कुलवीर (18) पुत्री श्रीचंद की रक्त जांच में प्लाज़्मोडियम फैल्सीपेरम बुखार की पुष्टि हुई है। हालत गंभीर होने पर शिखा को वार्ड में भर्ती कराया गया है। लगातार आरबीसी (लाल रक्त कणिकाएं) और हीमोग्लोबिन काउंट कम होने की वजह से शिखा को अब तक दो यूनिट खून चढ़ाया जा चुका है। जबकि, कुलवीर को परिजन आगरा ले गए हैं। फैल्सीपेरम के दो पॉजिटिव केस मिलने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग अभी खुलकर कुछ नहीं बोल रहा है। हालांकि शासन को गोपनीय रिपोर्ट भेज दी गई है। 1996 में बरपाया था कहर

जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. जेजे राम का कहना है कि यह मलेरिया का सबसे खतरनाक स्वरूप है। इसमें वायरस सीधा दिमाग पर हमला करता है। धीरे-धीरे आरबीसी की संख्या घटने लगती है। इसकी वजह से लीवर, किडनी फेल होने लगते हैं। कई बार तो मल्टीऑर्गन फेल्योर की समस्या भी बढ़ जाती है। एक बार 1996 में फैल्सीपेरम बुखार ने अपना कहर बरपाया था।

नहीं बदली गई बीएचटी, पायरेक्सिया का चल रहा इलाज: वार्ड में भर्ती शिखा को फैल्सीपेरम की पुष्टि हुई है। उसे चार अक्टूबर की दोपहर 3:20 बजे बुखार होने पर भर्ती किया गया था। पायरेक्सिया का उपचार चल रहा था। फैल्सीपेरम की पुष्टि होने के बावजूद बीएचटी (बेड हेड टिकट) को बदला नहीं गया है। पायरेक्सिया का ही उपचार दिया जा रहा है।

ऐसे फैलता है परजीवी का संक्रमण: परजीवी का पहला शिकार तथा वाहक मादा एनोफिलीज मच्छर बनती है। वयस्क मच्छर संक्रमित मनुष्य को काटकर उसके रक्त से मलेरिया परजीवी को ग्रहण कर लेते हैं। रक्त में मौजूद परजीवी के जननाणु मच्छर की आहार नली में नर और मादा के रूप में विकसित होते हैं और फिर मिलकर अंडाणु बनाते हैं, जो मच्छर की आहार नली की भित्तियों में पलने लगते हैं। परिपक्व होने पर ये फूटते हैं और इसमें से निकलने वाले बीजाणु उस मच्छर की लार-ग्रंथियों में पहुँच जाते हैं। जब मच्छर फिर एक स्वस्थ मनुष्य को काटता है तो त्वचा में लार के साथ-साथ बीजाणु भी छोड़ देता है, जिससे यह एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाता है। 'प्लाज़्मोडियम फैल्सीपेरम के मरीज की मॉनीटरिग बहुत जरूरी है। ऐसे मरीज में खून तेजी से कम होता है। जिसकी वजह से वह एनीमिया का शिकार हो जाता है। शिखा को खून चढ़ाया जा रहा है। लैब की जांच रिपोर्ट के आधार पर फैल्सीपेरम की आशंका जताई गई है। इसकी रिपोर्ट मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भी भेजी जा चुकी है। बालिका की स्थिति में अब सुधार है।'

डॉ. आरके सागर, सीएमएस

जिला अस्पताल।

Posted By: Jagran

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