महराजगंज: इतिहास के लिए विशेष काल खंड जिसे स्वाधीनता का प्रथम संग्राम कहा जाता है, 1857 से लेकर 1947 के आजादी की लड़ाई रही। समय-समय पर स्वतंत्रता के वीर उसमें अपनी आहुति देते रहे। स्वाधीनता का केवल राजनैतिक अर्थ लेते हैं तो लगेगा कि 15 अगस्त 1947 के दिन हमारा लक्ष्य पूरा हो चुका था। उस दिन राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष में हमें सफलता प्राप्त हुई और हम स्वाधीन हो गए। लेकिन, स्वाधीनता की हमारी अवधारणा बहुत व्यापक है। इसकी कोई बंधी-बंधाई और सीमित परिभाषा नहीं है। यह बातें श्रीसूर्य नारायण सिंह कन्या इंटर कालेज भिटौली की प्रधानाचार्य मनीषा पांडेय ने जागरण संस्कारशाला में कहीं।

उन्होंने कहा कि स्वाधीनता के दायरे को बढ़ाते रहना, एक निरंतर प्रयास है। 1947 में राजनैतिक आजादी मिलने के इतने दशक बाद भी प्रत्येक भारतीय, एक स्वाधीनता सेनानी की तरह ही देश के प्रति अपना योगदान दे सकता है। हमें स्वाधीनता को नए आयाम देने हैं और ऐसे प्रयास करते रहना है, जिनसे हमारे देश और देशवासियों को विकास के नए-नए अवसर प्राप्त हो सकें।

हमारे किसान, उन करोड़ों देशवासियों के लिए अन्न पैदा करते हैं, जिनसे वे कभी आमने-सामने मिले भी नहीं होते। देश के लिए खाद्य सुरक्षा और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराकर हमारी आजादी को शक्ति प्रदान करते हैं। जब हम उनके खेतों की पैदावार और उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए आधुनिक टेक्नालाजी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं। हमारे सैनिक, सरहदों पर, बर्फीले पहाड़ों पर, चिलचिलाती धूप में, सागर और आसमान में पूरी बहादुरी और चौकसी के साथ, देश की सुरक्षा में समर्पित रहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बल अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं। वे आतंकवाद का मुकाबला करते हैं, तथा अपराधों की रोकथाम और कानून-व्यवस्था की रक्षा करते हैं। तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।

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