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पारंपरिक हुनर को मिली आधुनिक रफ्तार, महराजगंज में दीपावली की आहट के बीच चाक पर दिनभर में आकार ले रहे डेढ़ हजार दीये

Published: Wed, 28 Oct 2026 03:02 PM (IST)

दीपावली की तैयारियों के बीच महराजगंज में कुम्हारों ने मिट्टी के दीयों का उत्पादन बढ़ा दिया है। मोटर चालित चाक ...और पढ़ें

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HighLights

  1. दीपावली के लिए मिट्टी के दीयों की मांग में भारी वृद्धि।

  2. कुम्हार मोटर चालित चाक से उत्पादन बढ़ाकर कर रहे तैयारी।

  3. यह पुश्तैनी काम परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार।

जागरण संवाददाता, निचलौल। दीपावली की तैयारियां तेज हो गई हैं। घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों की मांग को देखते हुए कुम्हारों ने भी अपने चाक की रफ्तार बढ़ा दी है। कहीं मिट्टी के दीये आकार ले रहे हैं तो कहीं दीपावली में पूजन के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की घंटी और अन्य सामग्री तैयार की जा रही है। बाजार में मशीनों से बने दीयों के साथ विदेशों से आए आकर्षक दीये भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। इसके बावजूद पारंपरिक मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।

पुश्तैनी काम से चल रहा परिवार का खर्च
कलनहीं निवासी हृदय लाल प्रजापति भी दीपावली को लेकर दीये बनाने में जुटे हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में दादा के समय से ही मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम होता आ रहा है। समय के साथ लोगों की पसंद और जरूरतें बदली हैं। अब मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हो गया है, लेकिन दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग आज भी बनी हुई है। हृदय लाल प्रजापति ने बताया कि पारंपरिक चाक से दीया बनाने में काफी समय लगता था।

पहले दिनभर मेहनत करने के बाद करीब छह से सात सौ दीये ही तैयार हो पाते थे। समय की बचत और उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने मोटर से चलने वाला चाक बनवा लिया। इससे दीया बनाने की रफ्तार बढ़ गई है। अब एक दिन में डेढ़ हजार से अधिक दीये तैयार कर लेते हैं। इससे कम समय में अधिक दीयों का निर्माण संभव हो पा रहा है।

दीयों की कमाई से परिवार का भरण-पोषण
हृदय लाल प्रजापति ने बताया कि पुश्तैनी काम से जुड़ाव होने के कारण वह आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। मिट्टी के दीया बनाकर और बेचकर होने वाली कमाई से परिवार का भरण-पोषण होता है। इसी आय से उन्होंने बच्चों की पढ़ाई पूरी कराई और उनकी शादी भी की।

दीपावली उनके लिए केवल त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत को आमदनी में बदलने का अवसर भी है। ऐसे में मिट्टी के दीयों की मांग कुम्हारों के पारंपरिक हुनर और उनकी आजीविका, दोनों को सहारा देती है।

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