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दुखों का पहाड़ भी नही डिगा सका हौसला, महराजगंज में दो मासूमों का सहारा बनीं ज्ञानती; झोपड़ी में कट रही बेबसी की जिंदगी

Published: Mon, 26 Oct 2026 03:45 PM (IST)

महाराजगंज में 65 वर्षीय ज्ञानती देवी अपने पति, दो बेटों और बेटी को खोने के बाद दो मासूम नातिनों का ...और पढ़ें

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HighLights

  1. 65 वर्षीय ज्ञानती देवी दो मासूम नातिनों का पालन-पोषण कर रही हैं।

  2. पति, दो बेटे, बेटी खोने के बाद बहू भी बच्चों को छोड़ गई।

  3. गरीबी, झोपड़ी में जीवन, सरकारी योजनाओं से वंचित, मदद का इंतजार।

प्रदीप कुमार गौड़, निचलौल। उम्र के जिस पड़ाव पर इंसान को अपनों के सहारे और सुकून की जरूरत होती है, उस उम्र में ज्ञानती देवी दो मासूम नातिनों का भविष्य संवारने की जद्दोजहद कर रही हैं। जिंदगी ने उनसे एक-एक कर पति, दो बेटों और बेटी को छीन लिया। बेटे की मौत के बाद बहू दोनों बच्चियों को छोड़कर चली गई।

अब आठ और पांच वर्ष की दो मासूमों के सिर पर दादी का ही आंचल है। गरीबी ऐसी कि पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है और सिर छिपाने के लिए पक्की छत तक नसीब नहीं है। निचलौल विकासखंड के कलनहीं खुर्द गांव निवासी 65 वर्षीय ज्ञानती देवी पत्नी स्व. रामा की जिंदगी दुखों से भरी है। पति की मौत के बाद उन्होंने परिवार को संभालने की कोशिश की, लेकिन नियति ने उनके छोटे बेटे भोली कुमार को भी छीन लिया। उसकी शादी नहीं हुई थी।

बेटी कोइली की भी अविवाहित अवस्था में मौत हो गई। इसके बाद बड़े बेटे राजेश की मृत्यु ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। राजेश की दो बेटियां मोहनी और चुलबुली मां के स्नेह से भी वंचित हो गईं। उनकी मां दोनों बच्चियों को छोड़कर दूसरे व्यक्ति के साथ चली गई। ऐसे में नातिनों की परवरिश की जिम्मेदारी दादी पर आ गई।

मांगकर भरती हैं नातिनों का पेट ज्ञानती देवी झोपड़ी में दोनों बच्चियों के साथ रहती हैं। आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें लोगों से मांगकर भोजन का इंतजाम करना पड़ता है। खुद उम्र और लाचारी से जूझ रही दादी बच्चियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनके पास न नियमित आमदनी का साधन है और न ही सुरक्षित आवास। जिसके कारण उन्हें सुबह शाम बच्चियों को भोजन कराने की चिंता सताती है।

वहीं दोनों बच्चियों के भविष्य को लेकर भी चिंता है। योजनाओं का लाभ मिलने का इंतजार ज्ञानती देवी के मुताबिक, पहले उनके पति के नाम अंत्योदय राशन कार्ड था, जो बाद में कट गया। अब उनके पास राशन कार्ड नहीं है। झोपड़ी में रहने के बावजूद आवास योजना का लाभ नहीं मिला और वह पेंशन से भी वंचित हैं।

सवाल यह है कि बेसहारा बुजुर्ग महिला और दो मासूम बच्चियों की बदहाली जिम्मेदारों की नजरों से अब तक कैसे ओझल रही? जरूरत है कि अधिकारी मामले की जांच कर पात्रता के आधार पर परिवार को राशन, आवास, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की पहल करें, ताकि दो मासूमों का बचपन अभावों के अंधेरे में न खो जाए।

बुजुर्ग महिला और उनके मासूम नातिनों के संबंध में जानकारी कर उन्हें जरूरी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। जो भी सरकारी योजनाएं संचालित हैं, उसका लाभ बुजुर्ग महिला को दिया जाएगा। - संतोष यादव यादव, खंड विकास अधिकारी

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