लखनऊ [राजीव दीक्षित]। सियासी हुक्मरानों के साथ लंबे समय तक काम करते हुए अधिकारियों के मन में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीज अंकुरित होने लगते हैं। अभी यूपी के चर्चित पुलिस अधिकारी असीम अरुण ने नौकरी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ली। पूर्व में भी कई अधिकारी रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक डगर पर चलने की कोशिश कर चुके हैं। हालांकि, अधिकांश का सफर आगे न जा सका।

नौकरशाही में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने के लिए चर्चित रहे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी विजय शंकर पांडेय ने उत्तर प्रदेश काडर के तीन भ्रष्टतम आइएएस अफसरों को चिह्नित करने की पहल करके ब्यूरोक्रेसी में भूचाल ला दिया था, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति की डगर पर चलने की कोशिश में लड़खड़ा गए। फैजाबाद (अब अयोध्या) के जिलाधिकारी रहे पांडेय ने अपनी कर्मभूमि रही इस सीट से 2019 के लोकसभा चुनाव में लोक गठबंधन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर किस्मत आजमाई तो सिर्फ 2056 वोट पा सके।

विजय शंकर पांडेय अकेले ऐसे अधिकारी नहीं हैं। बसपा के साथ सपा और भाजपा की साझा सरकारों में आइएएस अधिकारी राय सिंह को बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ तब सोफे पर बैठे देखा जाता था जब विभाग के मंत्री सामने फर्श पर बैठे होते थे। राय सिंह सेवानिवृत्ति के बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में लखीमपुर खीरी से कांग्रेस के टिकट पर मैदान में कूदे, लेकिन चौथे नंबर पर रहे। इसी तरह आइपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी ने भी रिटायरमेंट के बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में शाहाबाद सीट से रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के प्रत्याशी के तौर पर किस्मत आजमाई, लेकिन जमानत नहीं बचा सके। आइएएस अधिकारी देवीदयाल कुशल प्रशासक माने जाते थे, लेकिन सियासत में सफल न हो सके। बिजनौर से विधायक रहीं पत्नी ओमवती की राजनीतिक सफलता को देख आइएएस अधिकारी राम किशन सिंह भी राजनीति में कूदे, लेकिन आगे न बढ़ पाए।

नौकरी के दौरान भी राजनीतिक गतिविधियों में खासी दिलचस्पी रखने वाले आइएएस अधिकारी चंद्रपाल ने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देने की सोची। आगरा सुरक्षित सीट से चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत न सके। आदर्श समाज पार्टी बनाकर 2009 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन यह प्रयास भी काम न आया। लखनऊ के जिलाधिकारी रहे ओम पाठक 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लड़े, लेकिन महज 19 हजार वोट पा सके।

पीसीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में हरदेव सिंह की खूब हनक थी और प्रतिष्ठा भी। रिटायरमेंट के बाद हरदेव सिंह राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हुए और उसके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए 2021 के विधानसभा चुनाव में आगरा की एत्मादपुर सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह प्रांतीय पुलिस सेवा के अधिकारी शैलेंद्र सिंह ने कर्तव्यपालन में राजनीतिक बाधा से क्षुब्ध होकर नौकरी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति में कदम रखा। वह दो बार चुनाव लड़े, लेकिन जीत न सके। पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेहद भरोसेमंद अधिकारी रहे केएम संत भी राजनीति में आए, लेकिन सफल न हो सके। इसी तरह आइएएस राम आसरे प्रसाद और एसडी बागला और पीसीएस से सेवानिवृत्त विंध्यवासिनी प्रसाद सिंह भी चुनाव जीत न सके।

इन्हें मिली कामयाबी : राजनीति के सफर पर निकले कुछ ऐसे भी रहे जिन्हें कामयाबी मिली। मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह को सियासत की राह सुहाई और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने रालोद के मुखिया चौधरी अजित सिंह को उनके गढ़ बागपत में मात दी। सैन्य सेवा से रिटायर होने के बाद 2014 में गाजियाबाद सीट से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे जनरल वीके सिंह को केंद्र में मंत्री का ओहदा मिला। मुलायम और मायावती सरकारों में शासन के सर्वाधिक प्रभावशाली अफसर माने जाने वाले पीएल पुनिया ने रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस का दामन पकड़ा। वह 2009 के लोकसभा चुनाव में बाराबंकी सीट से जीते। अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के दौरान जिले के एसएसपी रहे देवेंद्र बहादुर राय को राम मंदिर आंदोलन के बाद 1996 और 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में फैजाबाद की जनता ने लोकसभा भेजा।

Edited By: Umesh Tiwari