उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव में संघों की पकड़ पड़ी कमजोर, राजनीतिक दलों का बढ़ा दबदबा
उत्तर प्रदेश में शिक्षक राजनीति की तस्वीर बदल गई है, जहां शिक्षक संघों का प्रभाव कमजोर हुआ है और राजनीतिक दलों का दबदबा बढ़ा है।

UP MLC Chunav |
HighLights
शिक्षक संघों की पकड़ हुई कमजोर, राजनीतिक दलों का बढ़ा प्रभाव।
विधान परिषद शिक्षक चुनावों में भाजपा-सपा ने जीतीं अधिकांश सीटें।
माध्यमिक शिक्षक संघ का कोई प्रतिनिधि नहीं जीत सका।
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। प्रदेश में शिक्षक राजनीति की तस्वीर बदल रही है। कभी विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक संगठनों का प्रभाव निर्णायक माना जाता था।
खासकर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के नेताओं की जीत को संगठन की ताकत और शिक्षकों के बीच उनकी पकड़ का प्रमाण माना जाता था। इस शिक्षक एमएलसी चुनाव में छह में से चार सीटें भाजपा और दो सीटें सपा ने जीती हैं। किसी भी सीट पर माध्यमिक शिक्षक संघ का प्रतिनिधि जीत नहीं सका।
इसकी एक बड़ी वजह संगठन की पुरानी एकजुटता का कमजोर होना और राजनीतिक दलों का चुनाव में सक्रिय होना है। शिक्षक संघों के भीतर अलग-अलग गुट और उनके बीच मतभेद भी चुनावी ताकत को प्रभावित करते रहे हैं।
शिक्षक राजनीति में माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का लंबे समय तक दबदबा रहा। दिवंगत ओमप्रकाश शर्मा 1972 से मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार आठ बार विधान परिषद पहुंचे। करीब 48 वर्ष तक उनका प्रतिनिधित्व शिक्षक राजनीति में संगठन की मजबूत पकड़ का प्रतीक रहा। वर्ष 2020 के चुनाव में भाजपा के श्रीचंद शर्मा ने उन्हें पराजित किया।
इस हार के साथ संगठन के लंबे वर्चस्व को पहली बड़ी चुनौती मिली। अब चुनाव परिणामों ने इस बदलाव को और स्पष्ट कर दिया है। शिक्षक संगठनों की ताकत केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रही है। पुरानी पेंशन, वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों का मानदेय और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार के सामने आवाज उठाना भी उनकी भूमिका का अहम हिस्सा रहा है।
उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रादेशिक उपाध्यक्ष डॉ. आरपी मिश्र का कहना है कि पहली बार है जब माध्यमिक शिक्षक संघ का कोई प्रतिनिधि नहीं जीता। पिछली बार ध्रुव कुमार त्रिपाठी शिक्षक प्रतिनिधि थे, लेकिन इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े।
छह शिक्षक सीटों पर संघ के चार प्रतिनिधियों ने चुनाव लड़ा। उनके मुताबिक, पहले विधान परिषद का यह सदन शिक्षकों का माना जाता था, लेकिन अब यहां भी राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ गया है।
वर्तमान में शिक्षक एमएलसी राजबहादुर सिंह चंदेल ही सदन में हैं, जिनका कार्यकाल वर्ष 2028 तक है। इस नतीजों ने शिक्षक संगठनों के सामने अपनी एकजुटता मजबूत करने और शिक्षकों के मुद्दों पर भरोसा कायम रखने की चुनौती खड़ी कर दी है।
