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MLC चुनाव में वाराणसी से आगरा तक के नतीजों से नैरेटिव मजबूत करेगी सपा, यूपी चुनाव से पहले फ्रंटफुट में खेलने की तैयारी

Published: Thu, 29 Oct 2026 01:03 AM (IST)

विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है, जहां सपा ने अपनी बढ़त ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

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HighLights

  1. सपा ने विधान परिषद चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया।

  2. भाजपा को वाराणसी में हार, गोरखपुर में कठिन जीत मिली।

  3. सपा को विधानसभा चुनाव के लिए नई ऊर्जा मिली।

राज्य ब्यूरो, जागरण, लखनऊ। विधान सभा चुनाव से पहले विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। पिछले चुनाव के मुकाबले अपनी बढ़त और संघर्षपूर्ण सीटों पर मजबूत प्रदर्शन से सपा ने भाजपा को झटका दिया है। भाजपा भले ही अपनी सीटों के आंकड़े के बराबर रहने की दुहाई दे रही हो, परंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हार और गोरखपुर में मिली कठिन जीत ने पार्टी को बेचैन किया है।

आगरा में पुनर्मतदान और सपा प्रत्याशी की जीत से भी सपा फ्रंटफुट पर है। पार्टी नतीजों को अपने मुद्दों और नैरेटिव की जीत मान रही है। चुनाव पढ़े-लिखे मतदाताओं का था और इन वर्ग को चुनावी माहौल बनाने के लिए भी अहम माना जाता है, ऐसे में सपा को विधान सभा चुनाव के लिए नई ऊर्जा मिली है।

विधान परिषद की जिन 11 सीटों पर चुनाव हुआ, उनमें वाराणसी की शिक्षक व स्नातक सीट और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीटें सपा के पास थीं। बुधवार रात 11 बजे तक घोषित परिणामों में सपा वाराणसी व आगरा शिक्षक सीट और इलाहाबाद-झांसी व लखनऊ स्नातक सीट जीत चुकी थी, जबकि वाराणसी स्नातक सीट पर आगे थी। चुनाव में सपा ने इस बार विधान सभा चुनाव की तरह ही प्रचार से मतदान तक बड़ी संख्या में नेताओं को जिम्मेदारी दी थी।

 आगरा के चुनाव में हुआ विवाद

आगरा में निर्दलीय एमएलसी डा. आकाश अग्रवाल और गोरखपुर में भाजपा के बागी डा. संजयन त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया था, वह भी पूर्व घोषित प्रत्याशियों को हटाकर। आगरा के चुनाव में विवाद हुआ। बूथ कैप्चरिंग के आरोप के बाद आयोग ने तीन बूथों पर पुनर्मतदान भी कराया। इस सीट पर भाजपा की रणनीति ध्वस्त नजर आई।

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जीत सपा के लिए भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुकाबले की गुंजाइश का संकेत है। विधान परिषद चुनाव का मतदाता वर्ग सीमित जरूर है, परंतु यह अपने सामाजिक दायरे में राय बनाने वाला है। ऐसे में परिणाम को संगठन के प्रभाव और शिक्षित मध्यवर्ग के बीच पकड़ के तौर पर भी देखा जाएगा।

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अब सपा अपने कार्यकर्ताओं के साथ जनता के बीच भी यह विश्वास पैदा करने की कोशिश करेगी कि भाजपा को उसके गढ़ में भी हराया जा सकता है। इस बीच सपा ने आगरा के चुनाव के सहारे वैश्य समाज को भी पीडीए का हिस्सा बताकर अपने सामाजिक समीकरण के विस्तार का भी दांव चला है। पार्टी शिक्षक भर्ती, पुरानी पेंशन, शिक्षामित्रों की समस्याएं, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के मुद्दों पर अपने नैरेटिव के सही होने का संदेश देगी।