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फिर तो अब ढहाने होंगे यूपी के ढाई लाख अवैध निर्माण, सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अधिकारियों की मिलीभगत पर उठे सवाल

Published: Tue, 22 Sep 2026 12:48 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट के मेरठ के अवैध निर्माणों पर कड़े रुख के बाद, उत्तर प्रदेश में वर्षों पुराने 2.5 लाख से ...और पढ़ें

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HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख से यूपी में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की उम्मीद।

  2. प्रदेश में 2.5 लाख से अधिक अवैध निर्माणों पर ध्वस्तीकरण के आदेश लंबित।

  3. इंजीनियरों की मिलीभगत से अवैध निर्माणों को संरक्षण मिलने का आरोप।

अजय जायसवाल, लखनऊ। मेरठ के अवैध निर्माणों को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख दिखाते हुए एक-एक अवैध निर्माण ढहाने की बात कही है, उससे प्रदेशभर के वर्षों पुराने अवैध निर्माणों को भी ध्वस्त करने का अब नंबर आ सकता है। ध्वस्तीकरण के कागजी आदेशों के बावजूद ढाई लाख से अधिक अवैध निर्माणों को विकास प्राधिकरण व आवास विकास परिषद ने अब तक नहीं ढहाया है।

अवैध निर्माणों पर अंकुश के लिए तमाम नियम-कानून की कब्र पर छोटे से बड़े शहरों में बड़ी संख्या में लगातार अवैध निर्माण हो रहे हैं। मानचित्र के विपरीत बने भवनों को ध्वस्त करने के आदेश तो वर्षों से फाइलों में हैं, लेकिन न अवैध भवन तेजी से ध्वस्त किए जा रहे हैं और न ही जिन अभियंताओं की सरपरस्ती में जानलेवा अवैध भवन बनाए गए हैं उनकी कोई जवाबदेही तय होती दिखती है।

बड़े-बड़े अवैध निर्माणों की यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार से लेकर सर्वोच्च अदालत तक समय-समय पर जारी आदेश में कड़ा रुख दिखाती रहती है। प्रदेशभर के शहरों में 4,37,193 अवैध निर्माण चिह्नित हैं। इनमें से 31 मार्च तक अवैध निर्माण संबंधी 1,86,267 मामलों को ही निस्तारित किया गया है। बिना नक्शा पास कराए आवासीय भूखंड पर व्यावसायिक काम्पलेक्स तक बना लिए गए, लेकिन उनके ध्वस्तीकरण के आदेश सिर्फ कागजों पर हैं।

स्थिति यह है कि अवैध निर्माणों को गिराने के आदेश पारित होने के बाद भी 2,56,252 अवैध भवन बरकरार हैं। ऐसा भी नहीं है कि ध्वस्तीकरण के आदेश एक-दो वर्ष पहले के हों बल्कि तीन दशक पुराने ध्वस्तीकरण के आदेश पर भी अब तक अमल नहीं किया गया है। गौरतलब है कि डेढ़ दशक पहले वर्ष 2012 में दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर तकरीबन चार वर्ष पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने भी अवैध निर्माणों को लेकर सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता पर नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की थी कि यह कैसे हुआ कि रिहायशी इलाकों में अवैध बहुमंजिली इमारतें व व्यावसायिक काम्पलेक्स बनते रहे और संबंधित विभागों को इसकी खबर तक नहीं लगी?

अभियंताओं की मिलीभगत से अवैध निर्माणों को न गिराए जाने का नतीजा है कि उन पर अंकुश लगने के बजाय अवैध निर्माणों की संख्या तेजी से बढ़ती ही जा रही है। ध्वस्तीकरण के कागजी आदेशों पर अमल न होने से ही तो लखनऊ में होटल लेवाना अग्निकांड और फिर 15 मासूमों की जान लेने वाला अलीगंज अग्निकांड हो चुका है।

उल्लेखनीय है कि आवास मंत्री का भी दायित्व संभाल रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्राधिकरण-परिषद के इंजीनियरों की मिलीभगत से शहरों में अवैध निर्माण के ‘खेल’ पर अंकुश लगाने के तमाम निर्देश दिए हैं, लेकिन अब तक तो कोई भी कारगर साबित होता नहीं दिखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से आवास एवं शहरी नियोजन के प्रमुख सचिव पी. गुरु प्रसाद को भी अवैध निर्माणों को लेकर किसी तरह की ढिलाई न बरतने की हिदायत दी है, उससे यही माना जा रहा है कि देर-सबेर प्रदेशभर के बड़े अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का नंबर आएगा ही।

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