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राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पद दो साल से रिक्त, हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

Published: Tue, 29 Sep 2026 12:40 AM (IST)

लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद की दो साल से अधिक समय से रिक्तता पर ...और पढ़ें

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HighLights

  1. मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष पद दो साल से रिक्त, हाई कोर्ट ने जवाब मांगा।

  2. सरकार से पूछा, रिक्तियों को भरने के लिए क्या कदम उठाए गए?

  3. 1959 भूमि अधिग्रहण मुआवजा, गर्भवती युवती पेश करने के आदेश।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पद लंबे समय से रिक्त रहने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। न्यायालय ने पूछा है कि आयोग जैसे महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय में रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद नियुक्तियों में देरी क्यों हुई। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने सुनील कांदू की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कहा गया है कि आयोग के अध्यक्ष का पद चार जून 2024 से रिक्त है। इसे रिक्त हुए दो साल से अधिक समय हो चुका है। आयोग में एक सदस्य का पद भी खाली है।

इसके चलते आयोग पूर्ण निर्धारित संरचना के साथ काम नहीं कर पा रहा है। याचिका में यह भी बताया गया कि जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के लगभग दो वर्षों से बिना अध्यक्ष काम करने और केवल दो सदस्यों के कार्यरत होने का तथ्य रखा गया था। हालांकि शीर्ष अदालत ने रिक्तियों से संबंधित याचिका पर सीधे सुनवाई करने के बजाय याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी थी।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के डीके बसु बनाम बंगाल राज्य मामले के वर्ष 2015 के फैसले का हवाला दिया गया है। इसमें राज्यों को निर्देश दिया गया था कि राज्य मानवाधिकार आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के पद रिक्त होने के तीन महीने के भीतर भरे जाएं। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि संभावित रिक्तियों की जानकारी पहले से होती है।

इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया समय रहते शुरू की जानी चाहिए, ताकि कोई पद तीन महीने से अधिक समय तक खाली न रहे। लखनऊ खंडपीठ ने सरकार से इसी संदर्भ में जवाब मांगा है कि चार जून 2024 से अध्यक्ष का पद रिक्त होने के बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की गई और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन अब तक क्यों नहीं हुआ।

65 साल पहले अधिग्रहित जमीन का मुआवजा न मिलने पर हाई कोर्ट सख्त
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने वर्ष 1959 में अधिग्रहित जमीन का मुआवजा अब तक पूरी तरह न मिलने के मामले में अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है।

कोर्ट ने लखनऊ की अपर जिलाधिकारी (भूमि अधिग्रहण) और मुख्य कोषाधिकारी को छह अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट अथारिटी (लारा) के आदेशों का अनुपालन न करने पर उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों न की जाए। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने राज कुमार शैलेंद्र सिंह की याचिका पर यह आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण की मूल कार्यवाही 1959 में हुई थी और 2019 से मुआवजे की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही लंबित है। इसके बावजूद याची को अब तक उसके अधिकार का पूरा मुआवजा नहीं मिल सका है। कोर्ट के समक्ष बताया गया कि कलेक्टर ने 14 अक्टूबर 1959 को मूल अवार्ड पारित किया था।

संदर्भ न्यायालय का अवार्ड छह सितंबर 1996 को आया, जबकि राज्य की प्रथम अपील 2007 में दाखिल हुई और नौ सितंबर 2019 को खारिज कर दी गई। अब तक याची को 11.72 लाख रुपये ही प्राप्त हुए हैं। लारा के अनुसार अगस्त 2025 तक 38,25,567.67 रुपये देय थे।

याची के अधिवक्ता अमित जयसवाल के अनुसार बकाया राशि पर 15 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी देय है। पीठ ने कहा कि लारा के कई आदेशों की अनदेखी की गई। एडीएम और कोषाधिकारी को छह अक्टूबर को उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई उसी दिन तय की है।

गर्भवती युवती को कल हाई कोर्ट में पेश करने का आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वृंदावन स्थित नारी निकेतन में रह रही गर्भवती युवती को 30 सितंबर को अदालत में पेश करने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने किशोर व अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है।

याचिका पति किशोर ने दायर की है। उसका दावा है कि उसने युवती से विवाह किया है। युवती पाक्सो एक्ट मामले में पीड़िता है। याचिका में आरोप है कि युवती को नारी निकेतन वृंदावन में निरुद्ध रखा गया है। याची के अधिवक्ता रवि शंकर तिवारी ने कोर्ट को बताया कि युवती निरक्षर है और कभी स्कूल नहीं गई, इसलिए उसका कोई शैक्षिक रिकार्ड नहीं है।

27 अप्रैल को हुए अस्थि परीक्षण (आसिफिकेशन टेस्ट) में उसकी उम्र 17 से 18 वर्ष आंकी गई थी। एफआइआर में भी उसकी उम्र 16-17 वर्ष और स्कूल न जाने का उल्लेख है। युवती ने बीएनएसएस की धारा 183 के तहत बयान में भी यही बात दोहराई है।

अधिवक्ता की दलील है कि युवती अब बालिग हो चुकी है और करीब नौ माह की गर्भवती है। इस आधार पर उसे कोर्ट में पेश किया जाए। कोर्ट ने प्रार्थना स्वीकार करते हुए नारी निकेतन अधीक्षक को 30 सितंबर को युवती को पेश करने का निर्देश दिया है।

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