'आपदा से अलग हादसों में मुआवजे के लिए स्पष्ट नीति बनाए राज्य सरकार', हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अलीगंज अग्निकांड पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को प्राकृतिक आपदा से इतर ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
हाईकोर्ट ने मुआवजे के लिए स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया।
अलग-अलग घटनाओं में अलग मुआवजा भेदभावपूर्ण हो सकता है।
घायल जयंत गुप्ता का इलाज खर्च सरकार उठाएगी।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। अलीगंज के भीषण अग्निकांड में मुआवजे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक आपदा से इतर घटनाओं में सरकार की ओर से दिए जाने वाले मुआवजे के लिए स्पष्ट नीति और निश्चित मापदंड होने चाहिए। अलग-अलग घटनाओं में अलग-अलग राशि दिया जाना भेदभाव और मनमानी की स्थिति पैदा कर सकता है।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने राज्य सरकार को ऐसी घटनाओं में मुआवजा देने के लिए नीति बनाने के पहलू पर विचार करने को कहा है।शिवेंदु पांडे की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से पूछा कि अलीगंज अग्निकांड के पीड़ित परिवारों को दी गई मुआवजा राशि पर्याप्त क्यों मानी जाए और इसे बढ़ाया क्यों न जाए।
कोर्ट के समक्ष बताया गया कि मृत प्रत्येक व्यक्ति के परिवार को विभिन्न स्रोतों से करीब 11 से 12 लाख रुपये की सहायता मिली है। इसमें मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से पांच लाख, राज्य आपदा मोचन निधि से चार लाख और प्रधानमंत्री राहत कोष से दो लाख रुपये शामिल हैं। कुछ परिवारों को प्रधानमंत्री राहत कोष की दो लाख रुपये की राशि अभी नहीं मिली है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार के अधिवक्ता वरुण पांडे से इसका सत्यापन कराने को कहा।अधिवक्ता अपूर्व तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के तीन निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि स्पष्ट नीति न होने पर मोटर दुर्घटना दावा मामलों के सिद्धांतों को मुआवजा तय करने का आधार बनाया जा सकता है।
कोर्ट ने सरकार से इन सिद्धांतों पर विचार करने और शपथपत्र दाखिल कर अब तक दिए गए मुआवजे तथा उसे बढ़ाने की आवश्यकता पर जवाब देने को कहा। वहीं, अग्निकांड में गंभीर रूप से घायल 25 वर्षीय जयंत गुप्ता का मामला भी अदालत में उठा। परिवार ने बताया कि जयंत दिव्यांग हो गया है और केजीएमयू में उसका उपचार चल रहा है।
इलाज पर करीब 70 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च हो रहा है, जबकि उसे अब तक केवल 50 हजार रुपये मुआवजा मिला है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि केजीएमयू जयंत से उपचार का कोई खर्च न ले। इलाज का जो भी बिल बने, उसे राज्य सरकार से मांगा जाए और सरकार उसका भुगतान सुनिश्चित करे।
पीठ ने प्रथम दृष्टया कहा कि घटना में केवल भवन स्वामी की चूक ही नहीं, संबंधित सरकारी अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भवन मालिक को पक्षकार बनाने की अनुमति देते हुए नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। सीलबंद लिफाफे में उपलब्ध एसओपी को आवश्यकता पड़ने पर पेश करने को भी कहा।
