कागजों में साफ हवा, चिमनियों से निकल रहा जहर, CEMS रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा; अब बोर्ड बनाएगा नया रोडमैप
उत्तर प्रदेश में उद्योगों की सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS) में गंभीर खामियां मिली हैं, जिससे प्रदूषण डेटा अविश्वसनीय हो गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।
HighLights
41 औद्योगिक इकाइयों में 163 CEMS की जांच में खामियां मिलीं।
अंशांकन, रखरखाव और डेटा सत्यापन में गंभीर लापरवाही सामने आई।
यूपीपीसीबी ने 18 महीने का सुधार रोडमैप तैयार किया है।
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। प्रदूषण पर निगरानी के लिए उद्योगों की चिमनियों पर लगाए गए सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (सीईएमएस) ही अगर सही आंकड़े न दें तो प्रदूषण नियंत्रण की पूरी कवायद पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। प्रदेश में सीईएमएस की स्थिति को लेकर हुए अध्ययन में यही तस्वीर सामने आई है।
अधिकतर उद्योगों में सिस्टम तो लगे हैं, लेकिन इनके अंशांकन (कैलिब्रेशन), रखरखाव और आंकड़ों के सत्यापन की व्यवस्था में गंभीर खामियां मिली हैं। ऐसे में इनसे मिलने वाले आंकड़ों को फिलहाल नियामकीय कार्रवाई का भरोसेमंद आधार नहीं माना जा सकता है।
आइ-फारेस्ट (इंटरनेशनल फोरम फार एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलाजी) ने यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के सहयोग से थर्मल पावर, चीनी, कागज, कपड़ा और सीमेंट समेत 41 औद्योगिक इकाइयों में लगे 163 सीईएमएस की जांच की। यह रिपोर्ट मंगलवार को जारी की गई।
वर्ष 2014 से अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों के लिए सीईएमएस लगाना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य चिमनियों से निकलने वाले प्रदूषकों की वास्तविक समय में निगरानी कर उनके आंकड़े सीधे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक पहुंचाना है। अध्ययन में पाया गया कि सिस्टम लगाने के बाद उसके सही संचालन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
नहीं मिली सत्यापन की प्रभावी व्यवस्था
अध्ययन में केवल 27 प्रतिशत उद्योग ही यह बता सके कि उनके यहां प्रमाणित सीईएमएस लगाए गए हैं। ज्यादातर इकाइयों में अंशांकन का काम वेंडर के भरोसे छोड़ दिया गया है। इससे सिस्टम से मिलने वाले आंकड़ों की शुद्धता प्रभावित हो रही है। किसी भी उद्योग में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि सीईएमएस से प्राप्त आंकड़ों को जांच के लिए जरूरी प्रारूप में बदला जा रहा है या नहीं। वहीं सिस्टम सही तरीके से स्थापित और संचालित हो रहा है या नहीं, इसके सत्यापन की भी प्रभावी व्यवस्था नहीं मिली।
इन कमियों को दूर करने के लिए बोर्ड ने 18 महीने का रोडमैप तैयार किया है। इसके तहत उद्योग चेकलिस्ट की मदद से अपने सीईएमएस की जांच करेंगे, कमियां दूर करेंगे और सिस्टम के सही होने का स्व-प्रमाणन करेंगे। बोर्ड अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के साथ आंकड़ों के सत्यापन की व्यवस्था विकसित करेगा। बोर्ड की प्रयोगशाला और प्रशिक्षण क्षमता भी बढ़ाई जाएगी।
स्टेट ट्रांसफार्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह ने कहा कि आनलाइन निगरानी प्रदूषण नियमन का भविष्य है और इसे पूरे प्रदेश में बढ़ाया जाना चाहिए। इससे नियमन मजबूत होने के साथ उद्योगों, विशेषकर छोटे उद्योगों पर अनुपालन का बोझ भी कम हो सकता है। उन्होंने सीईएमएस के सही अंशांकन को जरूरी बताते हुए कहा कि कार्रवाई सही आंकड़ों के आधार पर ही संभव है।
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आंकड़ों को सार्वजनिक करने और गड़बड़ी व छेड़छाड़ पकड़ने के लिए एआइ के इस्तेमाल से अनुपालन और मजबूत किया जा सकता है। बोर्ड के अध्यक्ष डा. रवींद्र प्रताप सिंह ने कहा कि बोर्ड आनलाइन निगरानी प्रणाली के विस्तार और सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में आइ-फारेस्ट के साथ मिलकर उद्योगों और अधिकारियों की क्षमता बढ़ाई जा रही है।
